वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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कि, मन विषयोंमें उसी समय तक फँसा रहता है, जब तब कि उसे ज्ञान नहीं होता। ज्ञान होते ही मन विषयोंके फन्देसे निकल जाता है।
मनके अनेक रंग हैं, जो छिन-छिनमें बदलते रहते हैं। जो एक ही रंगमें रँगा रहता है, वह कोई विरला ही होता है।
समुद्रकी जितनी लहर है, मनकी उतनी ही दौड़ है। अगर मन एक ही ठिकाने ठहर जावे, तो सहजमें हीरा पैदा हो जावे। मतलब यह है कि, मनके एक जगह ठहरने या स्थिर हो जानेसे सिद्धि मिल जा सकती है, जगदीशके दर्शन हो सकते हैं। चञ्चल मनसे सिद्धि दूर भागती है। जगदीश-मिलनके लिए स्थिर चित्तकी दरकार है।
मनके मते पर न चलना चाहिये, क्योंकि मनके अनेक मते हैं। मन पर सवार रहनेवाले, मनको अपने वशमें रखने वाले महात्मा कोई विरले हो होते हैं। सारांश यह कि, मनकी चाल पर न चलना चाहिये, उसकी सलाहके माफ़िक काम न करने चाहिये। मनको अपने क़ाबूमें रखना चाहिये और उसे अपनी इच्छानुसार चलाना चाहिये। जो मनकी राह पर नहीं चलते, मनके अधीन नहीं होते, मनको स्थिर रखते हैं, उसे चञ्चल नहीं होने देते, उसकी लगाम अपने हाथोंमें रखते और उसे अपनी मरज़ी माफ़िक चलाते हैं—स्वयं उसकी मरज़ी पर नहीं चलते, वे जगत्को विजय कर सकते हैं। वे नाना प्रकारकी सिद्धियोंको प्राप्त कर सकते हैं और जगदीशसे मिल कर अक्षय सुखके अधि-