भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कारी हो सकते हैं। जिन्हें संसारी जज्जालोंसे छूटना हो, जन्म-मरणके कष्ट न भोगने हों, नित्य और अविनाशी सुख भोगना हो, परमपद लाभ करना हो ; वे मनको अपने वशमें करें, उसे इधर-उधर जाननेसे रोकें और उसे करतारके ध्यानमें लगावें।

उस्ताद जौक एक जगह फिर कहते हैं—

बड़े मूजीका मारा, नफ़्ले अम्मारे का गर मारा।

नहंगो अजदहाश्रा, शेर नर मारा तो क्या मारा।

अपने दिलको मार, अभिमानको मार ; इसमें तेरी बड़ाई है। बड़े-बड़े खूबसूरत जानवरोंके मारनेमें वीरता नहीं है।

पर अभिमान-शून्य होना, है बड़ा कठिन। जिस वासनमें लहसल का प्याज़ रखे जाते हैं, उसमेंसे उनकी मध्य बड़ी कठिनाईसे जाती है ; इसी तरह अभिमान भी बड़ी कठिनाई से जाता है।

इसके नाशका उपाय विवेक या ज्ञान है। जब ज्ञानका उदय हो जाता है, तब जिस तरह पका हुआ आम आप-से-आप गिर पड़ता है ; उसी तरह अभिमान भी आप-से-आप दूर हो जाता है। अभिमानके नाश होते ही चित्त शुद्ध हो जाता है। चित्त के शुद्ध होनेसे परमात्माके दर्शन होनेकी राह साफ हो जाती है।

मनुष्यों ! अभ्यास करो, अभ्याससे सब कठिनाईयाँ हल हो जाती हैं। जैसे भी हो, मनको वासना-हीन बनाओ। वासना-

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