भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हीन, निर्मल विनष्ट वाले व्यक्ति पर उपदेश जल्दी असर करता है और उसमें ईश्वरानुराग शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है ।

दोहा ।

ऐसौ मैं संसार में, सुन्यो न देख्यो धीर ।

विषया-हथिनी संग लग्यो, मनगज चाँचे वीर ॥४६॥

46, O brother, wandering all the world over and seeking throughout the three Regions, we have neither seen nor heard of a man who has been successful in curbing the wild restlessness of his mind which is like a male-elephant turned mad through cupidity and pursuing his female for the gratification of his sensual desires

ये बद्धन्ते धनर्षतिपुरः प्रार्थनादुःखभाजो

ये चाल्यन्तं दधति विषयात्तेपर्यस्तबुद्धेः ।

तेषामन्तः स्फुरितहसितं वासरणान् स्मरेयं

ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरावशव्यानिषण्णः ॥४७॥

वे दिन जो धनके लिये धनवानोंकी खुशामद करनेके दुःखले बड़े मालूम होते थे और वे दिन जो विषयासक्तिमें छोटे लगते थे ; उन दोनों प्रकारके दिनोंको हम पर्वत की एकान्त गुहामें, पत्थरकी

धोर = धीरजवान । विषय-हथिनी = विषयरूपी हथिनी । मनगज = मन-रूपी हाथी । संग लग्यो = पीछे पड़ा हुआ । वीर = बहादुर ।