वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५३ )
शिलापर बैठे हुए, आत्मध्यानमें मग्न होकर, अन्तःकरणमें हँसते हुए याद करेंगे ॥४१॥
जिन लोगोंको अनेक प्रकारके पेशोइश्वरत और भोग-विलासके सामान मयस्सर है, जिनके यहाँ किसी भी संसारी भोग-विलासकी सामग्रीका अभाव नहीं है, जिनके सुन्दरी मृगनयनी कामिनी सेवा करनेको हैं, जिनके दास-दासी हैं, जिनके बाग-बगीचे हैं, जिनके गाड़ी-घोड़े और मोटर हैं, जिनके पीछे अनेक तरहके खुशामद लगे रहते हैं, जिनके हाथमें द्रव्य है अथवा जिनपर राजकृपा है—ऐसे लोगोंके दिन बड़ी जल्दी कटते हैं। उन्हें दिन-रात बीतते हुए मालूम ही नहीं होते, लम्बे-लम्बे दिन भी छोटे प्रतीत होते हैं; किन्तु जिन लोगोंको सब तरहका अभाव है, जो हर बातके लिये तड़्क हैं, जो अपनी इच्छा पूरी करनेके लिये धनियोंसे धन माँगते हैं, उनकी खुशामद करते हैं, उनकी दुत्कार-फटकार सहते हैं, अपमानित होते हैं, उनके लिये वे ही दिन बड़े भारी मालूम होते हैं—काटे भी नहीं कटते। किन्तु जो लोग विषयोंका सामान होते हुए भी विषय-सुख नहीं भोगते, और अभाव होने पर भी इच्छा नहीं रखते, इसलिये धनियोंके देहरे नहीं ढोकते, उनकी खुशामद नहीं करते, अपने आत्माराममें ही मस्त रहते हैं,—वे सुखी हैं; उन्हें दिन बड़े और छोटे नहीं लगते।
जिसने दोनों प्रकारके दिन देखे हैं, पर शेषमें उसे ऐसे भगड़ोंसे विरक्ति हो गयी है, वह कहता है,—मैं एकान्त गुफा-