वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५८ )
शालोलार्पतलोचना युवतयः स्वस्वेऽपि नालिगिताः
कालोऽयं परिण्डलोलुपतथा काकैरित प्रेरितः ॥४८॥
न तो हमने निष्कलंक विद्या पढ़ी और न धन कमाया ; न हमने शान्त चित्तसे माता-पिताकी सेवा ही की और न स्वप्नमें भी दीर्घनयनी कामिनियोंको गलेसे ही लगाया । हमने इस जगत्में आकर, कन्वेकी तरह पराये टुकड़ोंकी ओर ताक लगानेके सिवा, क्या किया ? ॥४८॥
जिस मनुष्यने औरोंकी खुशामद-बरामद या लहलहो-पत्तो करके अपना पेट भरा, टुकड़ोंके लिये सदा पराये मुँहकी ओर देखता रहा, वही शरूख शेषमें दुःखित होकर कहता है,—हाय मैंने बे-पैघ इक्षु भी न पढ़ा, धन भी उपार्जन न किया, मुगनयनी कामिनियोंका आलिङ्गन भी न किया और माता-पिताकी सेवा भी न की—मैंने वृथा जन्म लिया और अपना जीवन वृथा गुंवाया ।
जो संसारमें आकर न हवि-भजन करते हैं, न विद्या अध्ययन करते हैं, न धनोपार्जन करके सुख भोगते हैं और न संसार के दुःखियोंके दुःख ही दूर करते हैं, उनका इस दुनियामें आना वृथा है । किसीने कहा है—
न उधरके रहे, न उधरके रहे ।
न खुदा ही मिला, न विसाले सनम ॥