भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( १५८ )

शालोलार्पतलोचना युवतयः स्वस्वेऽपि नालिगिताः

कालोऽयं परिण्डलोलुपतथा काकैरित प्रेरितः ॥४८॥

न तो हमने निष्कलंक विद्या पढ़ी और न धन कमाया ; न हमने शान्त चित्तसे माता-पिताकी सेवा ही की और न स्वप्नमें भी दीर्घनयनी कामिनियोंको गलेसे ही लगाया । हमने इस जगत्में आकर, कन्वेकी तरह पराये टुकड़ोंकी ओर ताक लगानेके सिवा, क्या किया ? ॥४८॥

जिस मनुष्यने औरोंकी खुशामद-बरामद या लहलहो-पत्तो करके अपना पेट भरा, टुकड़ोंके लिये सदा पराये मुँहकी ओर देखता रहा, वही शरूख शेषमें दुःखित होकर कहता है,—हाय मैंने बे-पैघ इक्षु भी न पढ़ा, धन भी उपार्जन न किया, मुगनयनी कामिनियोंका आलिङ्गन भी न किया और माता-पिताकी सेवा भी न की—मैंने वृथा जन्म लिया और अपना जीवन वृथा गुंवाया ।

जो संसारमें आकर न हवि-भजन करते हैं, न विद्या अध्ययन करते हैं, न धनोपार्जन करके सुख भोगते हैं और न संसार के दुःखियोंके दुःख ही दूर करते हैं, उनका इस दुनियामें आना वृथा है । किसीने कहा है—

न उधरके रहे, न उधरके रहे ।

न खुदा ही मिला, न विसाले सनम ॥

( १५६ )

और भी किसीने कहा है—

कहा कियो हम आयेके, कहा करेंगे जाय ?

इतके भयेन उतके, चाले मूल गँवाय ॥

मतलब यह है, कि विद्या पढ़ना, विद्या-बुद्धिसे धन-उपाज्जन करना, सुख भोगना और माँ-बापकी सेवा करना अच्छा ; पर खाली पेट भरनेके लिये, कब्बेकी तरह पराया मुँह ताकना अच्छा नहीं। मुँह ही ताकना है, तो उस परमात्माका ताको, जो अभावशून्य है और सबका दाता है। उससे ही आपकी इच्छा पूरी होगी। अगर आप उसीका भरोसा करेंगे, तो वह आपके सब अभाव दूर करेगा, आपके दुःखोंमें दुःखी और आपके सुखोंमें सुखी होगा। उसके बिना आपकी भूख न मिटेगी। रहीम कहते हैं और सब कहते हैं—

रामचरण-पहिचान विन, मिटी न मनकी दौर ।

जनम गँवाये बादिही, रटत पराये पौर ॥

भगवान्के चरण-कमलोंसे परिचय हुए बिना, उनके पदपङ्क्तोंसे प्रेम हुए बिना, मनुष्यके मनकी दौड़ नहीं मिटती—मनकी चञ्चलता नहीं जाती और स्थिरता नहीं होती। मनके स्थिर हुए बिना भगवान्के भजनमें मन लग नहीं सकता। जो लोग गेहना बाना धारण करके साधु हो जाते हैं और भगवान्में मन नहीं लगाते—वे लोग पेटके लिए दर-दर चीख-चिल्लाकर अपना दुर्लभ मनुष्य-जन्म बुथा ही

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गँवाते हैं। वे मूर्ख इस बातको नहीं समझते, कि यह मनुष्य-जन्म बड़ी कठिनसे मिला है। ऐसा मौका फिर जल्दा नहीं मिलनेका। अगर यह जन्म पेटकी चिन्तामें गँवाया जायगा ; तो फिर चौरासी-लाख योनियोंमें जन्म लेनेके बाद कहीं मनुष्यजन्म मिलेगा। इससे तो यही अच्छा होता, कि वे संसारत्यागी बननेका दौग्न न रचकर, संसारी या गृहस्थ ही बने रहते। संसारी बने रहनेसे वे इस दुनियाके मिथ्या सुख-भोग तो भोग लेते। ऐसे दौग्नो दोनों तरफसे जाते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—

काम क्रोध मद लोभकी, जब लागि मनमें खान का पण्डित का मूरखै, दोनों एक समान । इत कुलकी करती तजे, उत न भजे भगवान । “तुलसी” अध्ववरके भये, ज्यों बधूरके पान ॥ “तुलसी” पति दरबारमें, कर्मै वस्तु कछु नाहिं । कर्महीन कलपत फिरत, चूक चाकरी माहिं ॥ राम गरीबनिवाज हैं, राम देत जन जानि । “तुलसी” मन परिहरत नहिं, घुरबिनिधाकी बानि ॥

काम, क्रोध, मद और लोभ—जब तक मनमें रहते हैं तब तक पण्डित और मूर्खमें कोई फ़र्क नहीं—दोनों ही समान हैं।

जो लोग केवल पुजनके लिए घर गृहस्थीको त्यागकर साधु बन-

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जाते हैं, वे अगर अपने रहें तो माता-पिताकी स्नेहा, आतिथ्य-सत्कार, पिण्डदान, ब्राह्मण-भोजन, सन्तानोत्पत्ति और कन्या-दान आदि गृहस्थके कर्म कर सकते हैं ; पर साधुवेष धारण करने से इन कामोंको नहीं कर सकते । दूसरी ओर, साधु होकर ईश्वर-भजन करना चाहिये, परपूर्विकि वे सच्चे साधु नहीं—काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ उनसे अलग नहीं—इसलिये उनका चित्त स्थिर नहीं होता । चित्तके स्थिर न होनेसे, ईश्वरमें भी उनका मन नहीं लगता । पेट भरनेके लिए वे घर-घर मारे-मारे फिरते हैं । इस तरह वे न तो घरके रहते हैं न घाटके । तुलसीदासजी कहते हैं, उनकी गति बवण्डर या बगुलेके पत्तेकीसी होती है, जो न तो आकाशमें ही जाता है और न जमीन पर ही रहता है—अधपरमें उड़ता फिरता है । इस तरह जन्म गँवाना—मूर्खता नहीं तो क्या है ? जो लोग मिहन्त-भजदूरी करके कामा नहीं सकते और बैठे-बैठे मिलता नहीं, वे कुटुम्बका पालन न कर सकनेकी वजहसे साधु बन जाते हैं । फिर वे दरदर टुकड़े माँगते और टोकरे खाते हैं । ईश्वरपर भी उनका भरोसा नहीं । अगर परमात्मा पर भरोसा होता, तो वे ध्यानस्थ होकर उसीका जप करते और वह भी उनकी फिक्र करता । जो उसके भरोसे निर्जन और बयाबाँ जंगलोंमें भी जाकर बैठ जाते हैं, उनको वह वहीँ पहुँचाता है, इसमें सन्देह नहीं । वह उसका नाम न जपनेवालोंको ही पहुँचाता है ; तब उसके ही भरोसे रहनेवालों और उसीकी माला जपने वालोंको वह कैसे भूल सकता है ?

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वह सवेरेसे श्रमम तक विश्वके प्राणियोंको खाना पहुँचाता है, विश्वका पालन करता है, इसीसे उसे विश्वभर कहते हैं। वह हाथीको मन और कीड़ीको कल पहुँचाता है, इसमें सन्देह नहीं। एक बार शाहन्शाह अकबर आज़मको उसके विश्वभर होनेमें सन्देह हुआ। उन्होंने एक कौँके बक्समें एक चींटी बन्द करवा दी। चींटीके उसमें बन्द किये जानेसे पहले, उन्होंने स्वयं अपने हाथोंसे बक्सका कोना-कोना देख लिया। फिर उसमें चींटी बन्द कराकर ताला लगा दिया और चाभी अपने पास रखली। बक्स भी दिन-रात अपने सामने ही रखा। २४ घण्टे बाद जब बक्स खोला गया, तो चींटीके मुँहमें एक चाँवलका दाना पाया गया। बादशाहका शक रफ़ा हो गया। उन्होंने भी उसे विश्वभर मान लिया।

तुलसीदासजी कहते हैं, स्वामीके दरबारमें किसी बीज़का अभाव नहीं है। उनके दरबारमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थ मौजूद हैं। उनके भक्त जो चाहते हैं, उन्हें वही मिल जाता है। उनके भक्तोंकी इच्छा होते ही स्रष्टि सिद्धि उनके कदमोंमें हाज़िर हो जाती है, पर शर्त यह है कि उनके भक्तोंका मन चलायमान न हो, उनका मन किसी दूसरी ओर न जाय। जो लोग ईश्वरकी चाकरीमें बूकते हैं, फिर चित्त होकर उसकी पूजा-उपासना नहीं करते, मनको अरह-जगह भटकाते हैं, वे कर्महीन दुःख पाते हैं, उनको मनवर्णित पदार्थ नहीं मिलते। सुखदाताको भूलनेसे सुख कैसे हो सकता है?

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भगवान् दीनबन्धु, दीनदयाल और गरीब-परवर हैं। वे दीनोंके दुःख दूर करने वाले और गरीबोंकी गरीबी या मुहताजी मिटाने वाले हैं। वे अपनोंको अपना समझ कर, इस लोक और परलोकके पूर्ण सुखेश्वर्य देते हैं। इस दुनियामें धर्म, धर्म और काम देते हैं और मरने पर, उस दुनियामें, स्वर्ग या मोक्ष देते हैं। मतलब यह है, जो ईश्वरकी शरणमें चले जाते हैं, ईश्वर अपने उन शरणगताओंकी इच्छाओंको उनके मनमें इच्छा होते ही पूरी कर देता है। पर अफसोस तो यही है कि, मन अपनी घुड़बिनियाकी आवृत नहीं छोड़ता अर्थात् मन संसारी पदार्थोंमें जाये बिना नहीं रहता। अगर मन संसारी पदार्थोंमें जाना छोड़ दे, तो दरिद्रता रहे हो क्यों? सारे अभाव दूर हो जायँ।

कृपय ।

विद्या रहित-कलंक, ताहि चितमें नहि धारी ।

धन उपजायो नाहि, सदा-संगी सुखकारी ।

मात-पिताकी सेव-सुश्रूषा, नेक न कीन्ही ।

मृगनयनी नवनारि, अंक भर कयहुँ न लीन्ही ।

रहित-कलंक-कलंकरहित-निर्दोष । ताहि-उसे, निर्दोष विद्याको। बारी-आरक्षकी । उपजायो-पैदा किया। सदा-संगी-सदा-सर्वदा साथ रहनेवाला। सेव-सुश्रूषा-सेवादृष्टल, क्षिप्रमत। नेक-जरा भी। मृग- नयनी-हिरनकेसे नेत्रोंवाली। नवनारि-नवोना स्त्री, सोलह सासकी

( १६४ )

योही व्यतीत कीन्हौ समय, ताकत डोल्यौ काक ज्यों ।

ले भज्यौ टूक पर हाथ तैं, चंचल चोर चलाक ज्यों ॥४८॥

48. We did not acquire knowledge pure of all blemishes, nor did we hoard wealth. We did not even serve our parents with a patient mind, or embrace youthful women with large and restless eyes even in our dreams. What did we do in this world except passing our days like a crow expecting to be given a morsel by others ?

वित्तौर्णै सर्वस्वे तरुणकरुणार्पूर्णहृदयाः

स्मरन्तः संसारे विगुणपरिणाम विधिगतीः ॥

वयं पुण्यारण्ये परिणतशरच्चन्द्रकिरणै-

क्षियामां नेष्यामो हरवरणचित्तैकरुणराः ॥४९॥

सर्वस्व त्यागकर (अथवा सर्वस्व नष्ट हो जाने पर) करुणा-पूर्ण हृदयसे, संसार और संसारके पदार्थोंका सारहीन समझकर, केवल शिव-चरणोंको अपना रक्षक समझते हुए, हम शरदकी चाँदनीमें, किसी पवित्र बनमें बैठे हुए कब रातें बितायेंगे ? ॥४९॥

वह दिन कब आवेगे, जब हम सर्वस्व त्याग कर, संसारको

बालों। अंक भर...लीन्हौ=झातीसे न लगायों। योही=वृथाहो। व्यतीत कीन्हौ=बिताया। ताकत डोल्यौ=देखता फिरा। काक ज्यों=कन्नेकी तरह। ले भज्यौ=ले भागा। टूक=टुकड़ा, रोटीका टुकड़ा। पर हाथ ते=पराये हाथसे। चंचल...ज्यों=चंचल और बालाक चोरकी तरह।

( १६२ )

असार समझ कर, संसारके सुखोंको अतिथ्य समझ कर, संसारके भोग-बिलासोंको दुःख-मूल समझकर, विषयोंको विष समझ कर, किसी पवित्र वनमें बैठे हुए शरद ऋतुकी चूर्दिनी रातको शिव-शिवकी रटना लगाते हुए व्यतीत करेंगे ! अर्थात् हमारे ये दिन जो संसारी जज्ञालोंमें बीते जा रहे हैं, वृथा नष्ट हो रहे हैं। जब हम सबको त्यागकर भगवान्का भजन करेंगे, तभी हमारे दिन ठीक तरहसे कटेंगे। हम उन्हीं दिनोंको सार्थक हुए समझेंगे। संसारी सुखोंसे तो हम अघा गये।

तुलसीदासजी कहते हैं—

दुखदायक जाने भले, सुखदायक भज राम ।

अब हमको संसारको, सब विधि पूरन काम ॥

हे मन ! अब परमात्मामें मन लगा ; संसारी सुखोंमें अब हमारी इच्छा नहीं ; इनकी पोछ हमने देखली ।

49. Now having renounced everything with our hearts full of deep emotions and looking back on the downfall brought about by evil actions done in the world, we will end our life passing our nights in a sacred forest where the rays of the winter moon are spreading, our hearts taking shelter only in the feet of the Great Shiva.

वयभिः पतिष्ठ्य वल्कलैस्तत्त्वं च लक्ष्म्या

सम. इह पतितोषो निर्विशेषावशेषः ॥

( १६६ )

स तु भवति दरिद्रो यस्य तुष्णा विशाला

मनसि च परिच्छे कोऽर्थवान्को दरिद्रः ? ॥५०॥

हम श्लोकों की छाल पहनकर सन्तुष्ट हैं ; आप लक्ष्मीसे सन्तुष्ट हो । हमारा तुम्हारा दोनोंका सन्तोष समान है, कोई भेद नहीं । वही दरिद्र है, जिसके दिलमें तुष्णा है । मनमें सन्तोष आने पर कौन धनी और कौन निर्धन है ? अर्थात् सन्तोषीके लिये धनी और निर्धन दोनों बराबर हैं ॥५०॥

जिसे सन्तोष है, वह सदा सुखी है । उसे कोई सुख नहीं, जिसकी इच्छायें बड़ी-बड़ी हैं । जिसे सन्तोष नहीं है, वह सदा दुःखी है । सन्तोष बड़ी-से-बड़ी दौलतसे भी अच्छा है । जो सुखी होना चाहे, वह तुष्णाको त्यागे और परमात्मा जो दे उसीमें सन्तोष करे । सन्तोषीके लिये कोई व्याधि नहीं है । सन्तोषीके चित्त, मन और काया सदा सुखी रहते हैं । सन्तोषी किसीकी खुशामद नहीं करता ।

उस्ताद जौक कहते हैं :—

जो कुञ्जे कनाश्रतमें हैं, तक्दीर पर शाकिर ।

है जौक बराबर, उन्हें कम और ज़ियादा ॥

जो सन्तोषी हैं, तक्दीर पर भरोंसा रखते हैं, उन्हें कम और ज़ियादा सभी बराबर हैं । उन्हें जो मिल जाय, उसी पर सम्ब है ।

( १६० )

शेख सादीने “गुलिस्ता”में लिखा है :—

ऐ क्नाश्रत तबन्गरस गरदाँ ।

के वराये तो हेच नेमत नेस्त ॥

हे सन्तोष ! मुझे धनी बना दे—क्योंकि संसारकी कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है ।

मनुष्यको चाहिये, कि सुखी रोटी और चिथड़ोंसे बनी गुरद्वीमें खुली रहे । मनुष्योंके ऐहसानोंका भार उठानेसे अपने दुःखाँका भार हलका न समझे । जो तंगनजर हैं, जो लोभी हैं, उनको या तो सन्तोषसे सुख मिलता है अथवा मर जाने से । सन्तोषकी तारीफ़में महात्मा कबीरकी भी सुनिये—

गो-धन गज-धन बाजि-धन, और रतन-धन-खानि ।

जब धावे सन्तोष-धन, सब धन घूरि-समान ॥

संसारमें गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन आदि अनेक तरहके धन हैं। कोई गायोंको धन मानता है, कोई हाथियोंको धन मानता है, कोई घोड़ोंको और कोई हीरे पन्ने नीलम पुखराज प्रभृतिको धन मानता है । संसारी लोग इन सबको ही धन समझते हैं, पर इन धनोंसे किसीकी भी तुष्णा नहीं कुफती, सन्तोष नहीं आता—शान्ति नहीं मिलती । जब सन्तोष रूपी धन मनुष्यके हाथ आता है ; तब वह गाय, बैल, ओढ़े, हाथी, सुहर-अशरफों और हीरे पन्ने प्रभृति धनोंको

( १६८ )

मिट्टीके समान समझता और सन्तोष-धनसे सुखी हो जाता है। सारांश यह कि, गाय, घोड़े, हाथी और हीरों पन्नों प्रभृति से किसको सुख-शान्ति नहीं मिलती। सुख-शान्ति मिलती है केवल सन्तोषसे ; अतः सन्तोष-धन सब धनोंसे बड़ा धन है। और धन देखनेमें अच्छे मालूम होते हैं, पर उनमें वास्तविक सुख नहीं—वास्तविक सुख सन्तोषमें ही है।

तुलसीदासजीकी भी सुनिये:—

जहाँ तोष तहाँ राम है, राम तोष नहीं भेद ।

“तुलसी” देखी गहत नहीं, सहत विविध विधि खेद ॥

मनुष्य जब दुनियाकी आदमियोंका आसरा-भरोसा छोड़ कर भगवान्की शरणमें जाता है, तब उसे सन्तोष होता है। भगवान्में और सन्तोषमें फर्क नहीं है। जहाँ सन्तोष है, वहाँ भगवान् हैं और जहाँ भगवान् हैं, वहाँ सन्तोष है। तुलसीदास जी कहते हैं—हमने आँखोंसे देखा है, जिन्होंने भी भगवान्को शरण नहीं और सन्तोष किया, वे निश्चय ही सुखी हुए। इसके विपरीत ; जो लोग दुनियावी मनुष्यों और धन प्रभृतिसे सुखकी आशा करते हैं, भगवानसे विमुख रहते हैं, उन पर भरोसा नहीं करते, एकमात्र उन्हींकी शरणमें नहीं जाते, वे नामा प्रकारके दुःख भोगते हैं। बचपनमें माँके मर जानेसे अथवा परतंत्र रहनेसे दुःख पाते हैं। जवानोंमें, अपनी स्त्रीको परयुक्तरता देखकर जलते-कुदते हैं अथवा पराई सुन्दरी स्त्रियोंको

( १६६ )

देखकर और उसे न पाकर कामाग्निमें भस्म होते हैं, अथवा पुत्र-कन्या और स्त्री प्रभृति प्यारोंके मरनेसे उनकी वियोगाग्निमें जल-जल कर दुखी होते हैं; अथवा धनके नाश हो जानेसे कलपते हैं। बुढ़ापेमें आँख, कान आदि इन्द्रियोंके बेकाम हो जाने और शरीरमें शक्ति न रहने एवं जने-जनेसे अपमानित होनेसे घोर दुःसह दुःख सहन करते हैं। जब तरह-तरहके रोग आकर घेर लेते हैं; तब जीवन भार-स्वरूप मालूम होता है। जब ऐसे-ऐसे कंकड़ोंमें, तृष्णाको साथ ठेकर मर जाते हैं; तब फिर चौरासी लाख योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं। इस तरह हजारों-लाखों बरस बाद—न जाने कब?—फिर मनुष्य-जन्म मिलता है। मनुष्य-देह पाकर ही मनुष्य अपने उद्धारका उपाय कर सकता है; क्योंकि इसी जन्ममें भले बुरेके विचारकी शक्ति होती है; और योनियोंमें तो पाप-ही-पाप होते हैं; अतः मनुष्य-जन्मको, मामूली बात समझकर, योंही दुनियाबी सुख-भोगोंमें न गँवाना चाहिये। संसारी सुख-भोगोंसे न तो इस दुनियामें सुख-शान्ति मिलती है और न इसके बादकी दुनियामें। इस लोकमें सुख भोगनेवालोंको लाखों बरसों तक घोर दुःख भोगने होते हैं। हाँ, जो लोग इस मनुष्य-देहकी क्रीमत समझ कर, सब संसारी सुखोंको लात मारकर, भगवान् की शरणमें चले जाते हैं और सन्तोष-वृत्ति रखते हैं; वे इस लोक और परलोकमें सदा सुख भोग करते और अन्तमें ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं।

( १०० )

क्षप्य ।

तुम धनसों सन्तुष्ट, हमहूँ हैं वृक्षबकल तैं । दोज भये समान, नैन मुख धंग सकल तैं । जाने जात दरिद्र, बहुत तृष्णा है जिनके । जिनके तृष्णा नाहिं, बहुत सम्पत है तिनके । तुमही विचार देखो हगन, को निर्धन ? धनवन्त को ? जूत पाप कौन ? निष्पापको ? को असन्त और सन्तको ? ॥५०॥

50 We are contented here only with the possession of the bark of trees, whilst thou art content with the possession of wealth. Contentment being the same, the difference between us is equalised, He is always poor whose desires are predominant in his mind while to a contented-man the rich and the poor are all alike

यदेतत्त्वच्छन्दं विहरणभकार्पण्यमशनं सहायैः संवासः श्रुतमुपशमैकत्रतफलम् ॥ मनो मन्दस्पर्न्दं बहिरपि चिरस्यापि विमृश- त्व जाने कस्यैषा परिणतिस्वरस्य तपसः ॥५१॥

हमहूँ हैं = हम भी हैं। वृक्षबकल तैं = पेड़ों की छालोंसे। दोज भये... सकल तैं = दोनों ही आँख और मुँह वगैरः सभी धंगोंसे बराबर हैं। तृष्णा = इच्छा। सम्पत = दौलत। हगन = धाँखों से। को = कौन। जूतपाप = पापयुक्त, पापी। निष्पाप = पाप-रहित। असन्त = दुष्ट ; जूतन। सन्त = सज्जन। को निधन...सन्तको ? = कौन निर्धन और कौन

( १७१ )

स्वाधीनतापूर्वक जीवन अतिवाहित करना, बिना माँगे खाना, विपदमें साहस रखनेवाले मित्रोंकी संगति करना, मनको वशमें करने की तरकीबें बताने वाले शास्त्रोंका पढ़ना-सुनना और चञ्चल चित्तको स्थिर करना—हम नहीं जानते, ये किस पूर्व-तपस्याके फलसे प्राप्त होते हैं ?

पराधीन मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता, उसे पैड़-पैड़ पर अपमानित, लाञ्छित और दुःखित होना पड़ता है। जो स्वाधीन है, किसीके अधीन नहीं है, वे ही सच्चे सुखिया हैं। जिनको अपने पेटके लिये किसीके सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता—किसीके सामने झीन बचन कहने नहीं पड़ते, जिनके दुःसमयमें सहायता देनेवाले, बिना कहे कष्ट निवारण करने वाले मित्र हैं; जो मनको शान्त करनेवाले और उसकी चञ्चलता दूर करनेवाले शास्त्रोंको पढ़ते हैं—वे भाग्यवान् हैं। कह नहीं सकते, उन्होंने ये उत्तम फल पूर्वजन्मके किस कठोर तपसे पाये हैं।

दोहा ।

सत्संगति स्वच्छन्दता, बिना क्रपणता भक्ष ।

जान्यो नहिं किहि तप किए, यह फल होत अत्यन्त ॥४१॥

धनवान् है ? कौन पापी और कौन पाप-रहित है ? कौन हुज्रन् और कौन सज्जन है ?

सत्संगति = सज्जनोंकी संगति, शरीरों की सहचरता । स्वच्छन्दता =

( १७२ )

51. I do not know which austere Tapa practised in the previous existence gives rise to the following fruits:—Living an independent life, dining without begging for food, company of friends ready to help in difficulty, listening to Shastras in such a way as will enable one to prepare for the vow of self-control, the slackening of mental restlessness and even when the mind grows restless, trying to restrain it by thoughtful consideration.

पाणिः पावं पवित्रं भ्रमणपरिगतं भैक्ष्यमक्षय्यमन्नं

विस्तीर्णं वस्त्रमाशासुदशकमलं तल्पमस्त्वपसुर्वी ॥

येषां निःसंगतांगीकरणपरिणतिः स्वात्मसन्तोषिणस्ते

धन्याः संन्यस्तेदेन्यव्यतिकरनिकराः कर्मनिर्गल्यन्ति ॥५२॥

वे ही प्रशंसाभाजन हैं, वे ही धन्य हैं, उन्हेंनोने ही कर्मकी जड़ काट दी है—जो अपने हाथोंके सिवा और किसी वासन की जरूरत नहीं समझते, जो घूम-घूमकर भिक्षाका अन्न खाते हैं, जो दशो-दिशाओं को ही अपना विस्तृत वस्त्र समझते हैं, जो सारी पृथ्वी का ही अपनी निर्मल शय्या समझते हैं, जो अकेले रहना पसन्द करते हैं, जो दीनतासे घृणा करते हैं और जिन्होंने आत्मामें ही सन्तोष कर लिया है ॥५२॥

जिन्होंने सबसे मन हटा कर, सब तरहके विषयोंको त्याग कर, संसारी माया-जाल काट कर, अपने आत्मामें ही सन्तोष

स्वतन्त्रता, आज़ादी। भक्त=खाना, भोजन। जान्यो नहिं=नहीं जानता। किहि तप किष्ट=कौनता तप करेते। इत प्रत्यक्ष=सिद्धते हैं।

( १७३ )

कर लिया है, जो किसी भी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रखते, यहाँ तक कि जल पीनेको भी कोई बर्तन पास नहीं रखते; अपने हाथोंसे ही बर्तनका काम ले लेते हैं; खानेके लिये घर में सामान नहीं रखते, कलके भोजनकी फिक नहीं करते, आज इस गाँवमें माँगकर पेट भर लेते हैं तो कल दूसरे गाँव में जा माँगते हैं, एक गाँवमें दो रात नहीं बिताते; जो शरीर ढकनेके लिये कपड़ोंको भी ऊरुरत नहीं रखते, दूधों दिसाओंको ही अपना वस्त्र समझते हैं; जो पलंग-तोशक और गहूँ तकियोंकी आवश्यकता नहीं समझते, ज़रासी ज़मीनको ही निर्मल पलंग समझते हैं; जब नींद आती है, अपने हाथका तकिया लगाकर सो जाते हैं; जो किसीका सद्गुरु नहीं करते, अकेले रहते हैं, बैराग्यमें ही परमानन्द समझते हैं; जो किसीके सामने दीनता नहीं करते—अथवा दैन्यरूपी व्यसनोंसे घृणा करते और अपने स्वरूपमें ही मगन रहते हैं, वे पुरुष सचमुच ही महापुरुष हैं। ऐसे पुरुषरत्न धन्य हैं ! उन्होंने सचमुच ही कर्म-बन्धन काट दिया है। वे ही सच्चे त्यागी और संन्यासी हैं। ऐसेही महापुरुषोंके सम्बन्धमें महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है—

काम ही न क्रोध जाके, लोभ ही न मोह ताके ।

मद ही न मत्सर, न कोज न विकारो है ॥

दुःख ही न सुख माने, मग्न ही न पुराय जाने ।

हरष न शोक धाने, देह ही तें न्यारो है ॥

( १७४ )

निन्दा न प्रशंसा करै, राग ही न द्वेष धरै । लेन ही न देन जाके, कुछ न पसरो है ॥ सुन्दर कहत, ताकी अगम अगाध गति । ऐसो कोउ साधु, सोतो रामजी कूँ प्यारो है ॥

जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर प्रभृति विचार नहीं हैं; जो दुःख-सुख और पाप-पुण्यको नहीं जानता; जिसे न खुशो होती है और न रञ्ज; जो अपने शरीर से अलग है; जो न किसीकी तारीफ़ करता है और न किसी की बुराई करता है; जिसे न किसीसे प्रेम है और न किसी से वैर है; जिसका न किसीसे छेना है और न किसीको देना है; न और ही किसी तरहका व्यवहार है। सुन्दरदास कहते हैं, ऐसे मनुष्यकी गति अगम्य और अगाध है। उसकी गहराईका पता नहीं। ऐसा ही महापुरुष भगवान्‌को प्यारा लगता है।

छप्पय ।

भोजनकों कर पट, दशों दिशि बसन बनाये । भखै भीखको अब्र, पल्लंग पृथ्वी पर छाये । छाँड़ि सबनको संग, अकेले रहत रैन दिन । नित आतस सों लीन, पौन सन्तोष छिनाहिं छिन ।

कर=हाथ। दशोंदिशि=धरब; पच्छिम आदि दश दिशाएँ। बसन=कपड़। भखै=खावे, खाता है। छाँड़ि सबनको संग=छो पुत्र आदिको

( १७५ )

मनको विकार, इन्द्रीनको डारै तोर मरोर जिन ।

वे धन्य २ संन्यास धन , कर्म किये निर्मूल तिन ॥५२॥

52. Praiseworthy are those and they alone who cut down the roots of Karma, who do not need any other vessel but their own hands for the purposes of drinking water etc, who eat only the food procured by leading the life of a wandering mendicant, who consider the endless space to be the only fit garments for them, who have the wide earth alone for their bed and whose mind has been trained into the habit of non-attachment by practising self-contentment.

दुराराध्यः स्वामी तुरगचलचिताः चित्तिशुजो

वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः ।

जरा देहं मृत्युहरति सकलं जीवितमिदं

सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषोऽन्यत्र तपसः ॥५३॥

मालिकको राजी करना कठिन है। राजाओंके दिल छोड़ों के समान चञ्चल होते हैं। इधर हमारी इच्छाएँ बड़ी भारी हैं; उधर हम बड़े भारी पद—मोक्षके अभिलाषी हैं। बुढ़ापा शरीर को निकम्मा करता है और मृत्यु जीवन को नाश करती है। इसलिये हे मित्र ! बुद्धिमान्के लिये, इस जगत्में, तपसे बढ़कर और कल्याण-का मार्ग नहीं है ॥५३॥

छोड़कर। रैनदिन=रात-दिन। * नित=नित्य। ब्रातम=ब्रातमा। निर्मूल=जड़ रहित। तिन=उन्होंने।

( १७६ )

सेवा-धर्म बड़ा कठिन है। हजारों प्रकारकी सेवायें करने, अनेक प्रकार की हाँ-में-हाँ मिलाने, दिनको रात और रातको दिन कहने, तरह-तरहकी खुशामदे करनेसे भी मालिक कभी सन्तुष्ट नहीं होता। राजाओंके दिल अशिक्षित घोड़ोंकी तरह चंचल होते हैं। उनके चित्त स्थिर नहीं रहते; ज़रासी देरमें वे प्रसन्न होते और ज़रासी देरमें अप्रसन्न हो जाते हैं; क्षणभरमें गाँव-के-गाँव बरुशते और क्षण-भरमें शूली पर चढ़वाते हैं, इसलिये राजसेवामें बड़ा ख़तरा है। उसमें ज़रा भी सुख नहीं, यहाँतक कि जानकी भी ख़ैर नहीं है। एक तरफ तो हमारी इच्छाओं और हमारे मनोरथोंकी सीमा नहीं है; दूसरी ओर हम परमपदके अभिलाषी हैं; इस लिये यहाँ भी मेल नहीं खाता। बुढ़ापा हमारे शरीरको निर्वल और रूपको कुरूप करता एवं सामर्थ्य और बलका नाश करता है तथा मृत्यु खिरपर मँडराती है। ऐसी दशामें मित्रवर ! कहीं सुख नहीं है। अगर सुख—सच्चा सुख चाहते हो, तो परमात्मा का भजन करो। उससे आपके इहलोक और परलोक दोनों सुधरेंगे, आप जन्म-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर मोक्ष-पद पायेंगे। सारांश यह है, कि सच्चा और नित्य सुख केवल वैराग्य और इश्वर-भक्तिमें है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं।

“तुलसी” मिटै न कल्पना, गये कल्पतरु-छाँह ।

जब लगि द्वै न करि कृपा, जनक-सुता को नाह ॥

( १७७ )

हित सन हित—रति राम सन, रिपु सन वैर विहाय ।

उदासीन संसार सन, “तुलसी” सहज सुभाय ॥

मनुष्य चाहे कल्पवृक्षके नीचे क्यों न चला जाय, जबतक स्तीतापतिकी रूपान न होगी तब तक उसके दुःखोंका नाश नहीं हो सकता ; इसलिये शत्रुता-मित्रता छोड़, संसारसे उदासीन हो, भगवान्से प्रीति करो ।

खुलासा—कहते हैं, इन्द्रके बगीचेमें एक पेसा वृक्ष है, जिसकी छायामें जाकर मनुष्य या देवता जो बीज चाहते हैं, वही उनके पास आप-से-आप आजाती है । उसी वृक्षको “कल्प-वृक्ष” कहते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, जब तक जानकी-नाथ रामचन्द्रजी दया करके प्रसन्न न हों तब तक, मनुष्यकी कल्पना, कल्पवृक्षकी छायामें जानसे भी, नहीं मिट सकती ।

जप, तप, तीर्थ, व्रत, शम, दम, दया, सत्य, शौच और दान वगैरः काम अगर मनमें वासना रखकर किये जाते हैं; यानी करनेवाला यदि उनका फल या पुरस्कार चाहता है, तो उसे स्वर्गादि मिलते हैं । स्वर्गमें जाने से मनुष्यका आवागमन—इस दुनियामें आना और यहाँसे फिर जाना—पैदा होना और मरना—नहीं बन्द हो सकता । क्योंकि कहा है—“पुण्ये क्षीणे मृत्युलोकै” अर्थात् पुण्योंके क्षीण होते ही फिर स्वर्गसे मृत्यु लोकमें आना पड़ता है । उपरोक्त जप-तप आदिसे स्वर्ग तो मिलता है, पर मनुष्यका असल मकसद पूरा नहीं होता ; यानी उसे परमपद या मोक्ष नहीं

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