वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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योही व्यतीत कीन्हौ समय, ताकत डोल्यौ काक ज्यों ।
ले भज्यौ टूक पर हाथ तैं, चंचल चोर चलाक ज्यों ॥४८॥
48. We did not acquire knowledge pure of all blemishes, nor did we hoard wealth. We did not even serve our parents with a patient mind, or embrace youthful women with large and restless eyes even in our dreams. What did we do in this world except passing our days like a crow expecting to be given a morsel by others ?
वित्तौर्णै सर्वस्वे तरुणकरुणार्पूर्णहृदयाः
स्मरन्तः संसारे विगुणपरिणाम विधिगतीः ॥
वयं पुण्यारण्ये परिणतशरच्चन्द्रकिरणै-
क्षियामां नेष्यामो हरवरणचित्तैकरुणराः ॥४९॥
सर्वस्व त्यागकर (अथवा सर्वस्व नष्ट हो जाने पर) करुणा-पूर्ण हृदयसे, संसार और संसारके पदार्थोंका सारहीन समझकर, केवल शिव-चरणोंको अपना रक्षक समझते हुए, हम शरदकी चाँदनीमें, किसी पवित्र बनमें बैठे हुए कब रातें बितायेंगे ? ॥४९॥
वह दिन कब आवेगे, जब हम सर्वस्व त्याग कर, संसारको
बालों। अंक भर...लीन्हौ=झातीसे न लगायों। योही=वृथाहो। व्यतीत कीन्हौ=बिताया। ताकत डोल्यौ=देखता फिरा। काक ज्यों=कन्नेकी तरह। ले भज्यौ=ले भागा। टूक=टुकड़ा, रोटीका टुकड़ा। पर हाथ ते=पराये हाथसे। चंचल...ज्यों=चंचल और बालाक चोरकी तरह।