भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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असार समझ कर, संसारके सुखोंको अतिथ्य समझ कर, संसारके भोग-बिलासोंको दुःख-मूल समझकर, विषयोंको विष समझ कर, किसी पवित्र वनमें बैठे हुए शरद ऋतुकी चूर्दिनी रातको शिव-शिवकी रटना लगाते हुए व्यतीत करेंगे ! अर्थात् हमारे ये दिन जो संसारी जज्ञालोंमें बीते जा रहे हैं, वृथा नष्ट हो रहे हैं। जब हम सबको त्यागकर भगवान्का भजन करेंगे, तभी हमारे दिन ठीक तरहसे कटेंगे। हम उन्हीं दिनोंको सार्थक हुए समझेंगे। संसारी सुखोंसे तो हम अघा गये।

तुलसीदासजी कहते हैं—

दुखदायक जाने भले, सुखदायक भज राम ।

अब हमको संसारको, सब विधि पूरन काम ॥

हे मन ! अब परमात्मामें मन लगा ; संसारी सुखोंमें अब हमारी इच्छा नहीं ; इनकी पोछ हमने देखली ।

49. Now having renounced everything with our hearts full of deep emotions and looking back on the downfall brought about by evil actions done in the world, we will end our life passing our nights in a sacred forest where the rays of the winter moon are spreading, our hearts taking shelter only in the feet of the Great Shiva.

वयभिः पतिष्ठ्य वल्कलैस्तत्त्वं च लक्ष्म्या

सम. इह पतितोषो निर्विशेषावशेषः ॥

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