भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १६६ )

स तु भवति दरिद्रो यस्य तुष्णा विशाला

मनसि च परिच्छे कोऽर्थवान्को दरिद्रः ? ॥५०॥

हम श्लोकों की छाल पहनकर सन्तुष्ट हैं ; आप लक्ष्मीसे सन्तुष्ट हो । हमारा तुम्हारा दोनोंका सन्तोष समान है, कोई भेद नहीं । वही दरिद्र है, जिसके दिलमें तुष्णा है । मनमें सन्तोष आने पर कौन धनी और कौन निर्धन है ? अर्थात् सन्तोषीके लिये धनी और निर्धन दोनों बराबर हैं ॥५०॥

जिसे सन्तोष है, वह सदा सुखी है । उसे कोई सुख नहीं, जिसकी इच्छायें बड़ी-बड़ी हैं । जिसे सन्तोष नहीं है, वह सदा दुःखी है । सन्तोष बड़ी-से-बड़ी दौलतसे भी अच्छा है । जो सुखी होना चाहे, वह तुष्णाको त्यागे और परमात्मा जो दे उसीमें सन्तोष करे । सन्तोषीके लिये कोई व्याधि नहीं है । सन्तोषीके चित्त, मन और काया सदा सुखी रहते हैं । सन्तोषी किसीकी खुशामद नहीं करता ।

उस्ताद जौक कहते हैं :—

जो कुञ्जे कनाश्रतमें हैं, तक्दीर पर शाकिर ।

है जौक बराबर, उन्हें कम और ज़ियादा ॥

जो सन्तोषी हैं, तक्दीर पर भरोंसा रखते हैं, उन्हें कम और ज़ियादा सभी बराबर हैं । उन्हें जो मिल जाय, उसी पर सम्ब है ।