भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १६० )

शेख सादीने “गुलिस्ता”में लिखा है :—

ऐ क्नाश्रत तबन्गरस गरदाँ ।

के वराये तो हेच नेमत नेस्त ॥

हे सन्तोष ! मुझे धनी बना दे—क्योंकि संसारकी कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है ।

मनुष्यको चाहिये, कि सुखी रोटी और चिथड़ोंसे बनी गुरद्वीमें खुली रहे । मनुष्योंके ऐहसानोंका भार उठानेसे अपने दुःखाँका भार हलका न समझे । जो तंगनजर हैं, जो लोभी हैं, उनको या तो सन्तोषसे सुख मिलता है अथवा मर जाने से । सन्तोषकी तारीफ़में महात्मा कबीरकी भी सुनिये—

गो-धन गज-धन बाजि-धन, और रतन-धन-खानि ।

जब धावे सन्तोष-धन, सब धन घूरि-समान ॥

संसारमें गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन आदि अनेक तरहके धन हैं। कोई गायोंको धन मानता है, कोई हाथियोंको धन मानता है, कोई घोड़ोंको और कोई हीरे पन्ने नीलम पुखराज प्रभृतिको धन मानता है । संसारी लोग इन सबको ही धन समझते हैं, पर इन धनोंसे किसीकी भी तुष्णा नहीं कुफती, सन्तोष नहीं आता—शान्ति नहीं मिलती । जब सन्तोष रूपी धन मनुष्यके हाथ आता है ; तब वह गाय, बैल, ओढ़े, हाथी, सुहर-अशरफों और हीरे पन्ने प्रभृति धनोंको