वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मिट्टीके समान समझता और सन्तोष-धनसे सुखी हो जाता है। सारांश यह कि, गाय, घोड़े, हाथी और हीरों पन्नों प्रभृति से किसको सुख-शान्ति नहीं मिलती। सुख-शान्ति मिलती है केवल सन्तोषसे ; अतः सन्तोष-धन सब धनोंसे बड़ा धन है। और धन देखनेमें अच्छे मालूम होते हैं, पर उनमें वास्तविक सुख नहीं—वास्तविक सुख सन्तोषमें ही है।
तुलसीदासजीकी भी सुनिये:—
जहाँ तोष तहाँ राम है, राम तोष नहीं भेद ।
“तुलसी” देखी गहत नहीं, सहत विविध विधि खेद ॥
मनुष्य जब दुनियाकी आदमियोंका आसरा-भरोसा छोड़ कर भगवान्की शरणमें जाता है, तब उसे सन्तोष होता है। भगवान्में और सन्तोषमें फर्क नहीं है। जहाँ सन्तोष है, वहाँ भगवान् हैं और जहाँ भगवान् हैं, वहाँ सन्तोष है। तुलसीदास जी कहते हैं—हमने आँखोंसे देखा है, जिन्होंने भी भगवान्को शरण नहीं और सन्तोष किया, वे निश्चय ही सुखी हुए। इसके विपरीत ; जो लोग दुनियावी मनुष्यों और धन प्रभृतिसे सुखकी आशा करते हैं, भगवानसे विमुख रहते हैं, उन पर भरोसा नहीं करते, एकमात्र उन्हींकी शरणमें नहीं जाते, वे नामा प्रकारके दुःख भोगते हैं। बचपनमें माँके मर जानेसे अथवा परतंत्र रहनेसे दुःख पाते हैं। जवानोंमें, अपनी स्त्रीको परयुक्तरता देखकर जलते-कुदते हैं अथवा पराई सुन्दरी स्त्रियोंको