भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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देखकर और उसे न पाकर कामाग्निमें भस्म होते हैं, अथवा पुत्र-कन्या और स्त्री प्रभृति प्यारोंके मरनेसे उनकी वियोगाग्निमें जल-जल कर दुखी होते हैं; अथवा धनके नाश हो जानेसे कलपते हैं। बुढ़ापेमें आँख, कान आदि इन्द्रियोंके बेकाम हो जाने और शरीरमें शक्ति न रहने एवं जने-जनेसे अपमानित होनेसे घोर दुःसह दुःख सहन करते हैं। जब तरह-तरहके रोग आकर घेर लेते हैं; तब जीवन भार-स्वरूप मालूम होता है। जब ऐसे-ऐसे कंकड़ोंमें, तृष्णाको साथ ठेकर मर जाते हैं; तब फिर चौरासी लाख योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं। इस तरह हजारों-लाखों बरस बाद—न जाने कब?—फिर मनुष्य-जन्म मिलता है। मनुष्य-देह पाकर ही मनुष्य अपने उद्धारका उपाय कर सकता है; क्योंकि इसी जन्ममें भले बुरेके विचारकी शक्ति होती है; और योनियोंमें तो पाप-ही-पाप होते हैं; अतः मनुष्य-जन्मको, मामूली बात समझकर, योंही दुनियाबी सुख-भोगोंमें न गँवाना चाहिये। संसारी सुख-भोगोंसे न तो इस दुनियामें सुख-शान्ति मिलती है और न इसके बादकी दुनियामें। इस लोकमें सुख भोगनेवालोंको लाखों बरसों तक घोर दुःख भोगने होते हैं। हाँ, जो लोग इस मनुष्य-देहकी क्रीमत समझ कर, सब संसारी सुखोंको लात मारकर, भगवान् की शरणमें चले जाते हैं और सन्तोष-वृत्ति रखते हैं; वे इस लोक और परलोकमें सदा सुख भोग करते और अन्तमें ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं।