वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षप्य ।
तुम धनसों सन्तुष्ट, हमहूँ हैं वृक्षबकल तैं । दोज भये समान, नैन मुख धंग सकल तैं । जाने जात दरिद्र, बहुत तृष्णा है जिनके । जिनके तृष्णा नाहिं, बहुत सम्पत है तिनके । तुमही विचार देखो हगन, को निर्धन ? धनवन्त को ? जूत पाप कौन ? निष्पापको ? को असन्त और सन्तको ? ॥५०॥
50 We are contented here only with the possession of the bark of trees, whilst thou art content with the possession of wealth. Contentment being the same, the difference between us is equalised, He is always poor whose desires are predominant in his mind while to a contented-man the rich and the poor are all alike
यदेतत्त्वच्छन्दं विहरणभकार्पण्यमशनं सहायैः संवासः श्रुतमुपशमैकत्रतफलम् ॥ मनो मन्दस्पर्न्दं बहिरपि चिरस्यापि विमृश- त्व जाने कस्यैषा परिणतिस्वरस्य तपसः ॥५१॥
हमहूँ हैं = हम भी हैं। वृक्षबकल तैं = पेड़ों की छालोंसे। दोज भये... सकल तैं = दोनों ही आँख और मुँह वगैरः सभी धंगोंसे बराबर हैं। तृष्णा = इच्छा। सम्पत = दौलत। हगन = धाँखों से। को = कौन। जूतपाप = पापयुक्त, पापी। निष्पाप = पाप-रहित। असन्त = दुष्ट ; जूतन। सन्त = सज्जन। को निधन...सन्तको ? = कौन निर्धन और कौन