भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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स्वाधीनतापूर्वक जीवन अतिवाहित करना, बिना माँगे खाना, विपदमें साहस रखनेवाले मित्रोंकी संगति करना, मनको वशमें करने की तरकीबें बताने वाले शास्त्रोंका पढ़ना-सुनना और चञ्चल चित्तको स्थिर करना—हम नहीं जानते, ये किस पूर्व-तपस्याके फलसे प्राप्त होते हैं ?

पराधीन मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता, उसे पैड़-पैड़ पर अपमानित, लाञ्छित और दुःखित होना पड़ता है। जो स्वाधीन है, किसीके अधीन नहीं है, वे ही सच्चे सुखिया हैं। जिनको अपने पेटके लिये किसीके सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता—किसीके सामने झीन बचन कहने नहीं पड़ते, जिनके दुःसमयमें सहायता देनेवाले, बिना कहे कष्ट निवारण करने वाले मित्र हैं; जो मनको शान्त करनेवाले और उसकी चञ्चलता दूर करनेवाले शास्त्रोंको पढ़ते हैं—वे भाग्यवान् हैं। कह नहीं सकते, उन्होंने ये उत्तम फल पूर्वजन्मके किस कठोर तपसे पाये हैं।

दोहा ।

सत्संगति स्वच्छन्दता, बिना क्रपणता भक्ष ।

जान्यो नहिं किहि तप किए, यह फल होत अत्यन्त ॥४१॥

धनवान् है ? कौन पापी और कौन पाप-रहित है ? कौन हुज्रन् और कौन सज्जन है ?

सत्संगति = सज्जनोंकी संगति, शरीरों की सहचरता । स्वच्छन्दता =