भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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51. I do not know which austere Tapa practised in the previous existence gives rise to the following fruits:—Living an independent life, dining without begging for food, company of friends ready to help in difficulty, listening to Shastras in such a way as will enable one to prepare for the vow of self-control, the slackening of mental restlessness and even when the mind grows restless, trying to restrain it by thoughtful consideration.

पाणिः पावं पवित्रं भ्रमणपरिगतं भैक्ष्यमक्षय्यमन्नं

विस्तीर्णं वस्त्रमाशासुदशकमलं तल्पमस्त्वपसुर्वी ॥

येषां निःसंगतांगीकरणपरिणतिः स्वात्मसन्तोषिणस्ते

धन्याः संन्यस्तेदेन्यव्यतिकरनिकराः कर्मनिर्गल्यन्ति ॥५२॥

वे ही प्रशंसाभाजन हैं, वे ही धन्य हैं, उन्हेंनोने ही कर्मकी जड़ काट दी है—जो अपने हाथोंके सिवा और किसी वासन की जरूरत नहीं समझते, जो घूम-घूमकर भिक्षाका अन्न खाते हैं, जो दशो-दिशाओं को ही अपना विस्तृत वस्त्र समझते हैं, जो सारी पृथ्वी का ही अपनी निर्मल शय्या समझते हैं, जो अकेले रहना पसन्द करते हैं, जो दीनतासे घृणा करते हैं और जिन्होंने आत्मामें ही सन्तोष कर लिया है ॥५२॥

जिन्होंने सबसे मन हटा कर, सब तरहके विषयोंको त्याग कर, संसारी माया-जाल काट कर, अपने आत्मामें ही सन्तोष

स्वतन्त्रता, आज़ादी। भक्त=खाना, भोजन। जान्यो नहिं=नहीं जानता। किहि तप किष्ट=कौनता तप करेते। इत प्रत्यक्ष=सिद्धते हैं।