भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कर लिया है, जो किसी भी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रखते, यहाँ तक कि जल पीनेको भी कोई बर्तन पास नहीं रखते; अपने हाथोंसे ही बर्तनका काम ले लेते हैं; खानेके लिये घर में सामान नहीं रखते, कलके भोजनकी फिक नहीं करते, आज इस गाँवमें माँगकर पेट भर लेते हैं तो कल दूसरे गाँव में जा माँगते हैं, एक गाँवमें दो रात नहीं बिताते; जो शरीर ढकनेके लिये कपड़ोंको भी ऊरुरत नहीं रखते, दूधों दिसाओंको ही अपना वस्त्र समझते हैं; जो पलंग-तोशक और गहूँ तकियोंकी आवश्यकता नहीं समझते, ज़रासी ज़मीनको ही निर्मल पलंग समझते हैं; जब नींद आती है, अपने हाथका तकिया लगाकर सो जाते हैं; जो किसीका सद्गुरु नहीं करते, अकेले रहते हैं, बैराग्यमें ही परमानन्द समझते हैं; जो किसीके सामने दीनता नहीं करते—अथवा दैन्यरूपी व्यसनोंसे घृणा करते और अपने स्वरूपमें ही मगन रहते हैं, वे पुरुष सचमुच ही महापुरुष हैं। ऐसे पुरुषरत्न धन्य हैं ! उन्होंने सचमुच ही कर्म-बन्धन काट दिया है। वे ही सच्चे त्यागी और संन्यासी हैं। ऐसेही महापुरुषोंके सम्बन्धमें महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है—

काम ही न क्रोध जाके, लोभ ही न मोह ताके ।

मद ही न मत्सर, न कोज न विकारो है ॥

दुःख ही न सुख माने, मग्न ही न पुराय जाने ।

हरष न शोक धाने, देह ही तें न्यारो है ॥