वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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निन्दा न प्रशंसा करै, राग ही न द्वेष धरै । लेन ही न देन जाके, कुछ न पसरो है ॥ सुन्दर कहत, ताकी अगम अगाध गति । ऐसो कोउ साधु, सोतो रामजी कूँ प्यारो है ॥
जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर प्रभृति विचार नहीं हैं; जो दुःख-सुख और पाप-पुण्यको नहीं जानता; जिसे न खुशो होती है और न रञ्ज; जो अपने शरीर से अलग है; जो न किसीकी तारीफ़ करता है और न किसी की बुराई करता है; जिसे न किसीसे प्रेम है और न किसी से वैर है; जिसका न किसीसे छेना है और न किसीको देना है; न और ही किसी तरहका व्यवहार है। सुन्दरदास कहते हैं, ऐसे मनुष्यकी गति अगम्य और अगाध है। उसकी गहराईका पता नहीं। ऐसा ही महापुरुष भगवान्को प्यारा लगता है।
छप्पय ।
भोजनकों कर पट, दशों दिशि बसन बनाये । भखै भीखको अब्र, पल्लंग पृथ्वी पर छाये । छाँड़ि सबनको संग, अकेले रहत रैन दिन । नित आतस सों लीन, पौन सन्तोष छिनाहिं छिन ।
कर=हाथ। दशोंदिशि=धरब; पच्छिम आदि दश दिशाएँ। बसन=कपड़। भखै=खावे, खाता है। छाँड़ि सबनको संग=छो पुत्र आदिको