वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मिट्टीके समान समझता और सन्तोष-धनसे सुखी हो जाता है। सारांश यह कि, गाय, घोड़े, हाथी और हीरों पन्नों प्रभृति से किसको सुख-शान्ति नहीं मिलती। सुख-शान्ति मिलती है केवल सन्तोषसे ; अतः सन्तोष-धन सब धनोंसे बड़ा धन है। और धन देखनेमें अच्छे मालूम होते हैं, पर उनमें वास्तविक सुख नहीं—वास्तविक सुख सन्तोषमें ही है।
तुलसीदासजीकी भी सुनिये:—
जहाँ तोष तहाँ राम है, राम तोष नहीं भेद ।
“तुलसी” देखी गहत नहीं, सहत विविध विधि खेद ॥
मनुष्य जब दुनियाकी आदमियोंका आसरा-भरोसा छोड़ कर भगवान्की शरणमें जाता है, तब उसे सन्तोष होता है। भगवान्में और सन्तोषमें फर्क नहीं है। जहाँ सन्तोष है, वहाँ भगवान् हैं और जहाँ भगवान् हैं, वहाँ सन्तोष है। तुलसीदास जी कहते हैं—हमने आँखोंसे देखा है, जिन्होंने भी भगवान्को शरण नहीं और सन्तोष किया, वे निश्चय ही सुखी हुए। इसके विपरीत ; जो लोग दुनियावी मनुष्यों और धन प्रभृतिसे सुखकी आशा करते हैं, भगवानसे विमुख रहते हैं, उन पर भरोसा नहीं करते, एकमात्र उन्हींकी शरणमें नहीं जाते, वे नामा प्रकारके दुःख भोगते हैं। बचपनमें माँके मर जानेसे अथवा परतंत्र रहनेसे दुःख पाते हैं। जवानोंमें, अपनी स्त्रीको परयुक्तरता देखकर जलते-कुदते हैं अथवा पराई सुन्दरी स्त्रियोंको
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देखकर और उसे न पाकर कामाग्निमें भस्म होते हैं, अथवा पुत्र-कन्या और स्त्री प्रभृति प्यारोंके मरनेसे उनकी वियोगाग्निमें जल-जल कर दुखी होते हैं; अथवा धनके नाश हो जानेसे कलपते हैं। बुढ़ापेमें आँख, कान आदि इन्द्रियोंके बेकाम हो जाने और शरीरमें शक्ति न रहने एवं जने-जनेसे अपमानित होनेसे घोर दुःसह दुःख सहन करते हैं। जब तरह-तरहके रोग आकर घेर लेते हैं; तब जीवन भार-स्वरूप मालूम होता है। जब ऐसे-ऐसे कंकड़ोंमें, तृष्णाको साथ ठेकर मर जाते हैं; तब फिर चौरासी लाख योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं। इस तरह हजारों-लाखों बरस बाद—न जाने कब?—फिर मनुष्य-जन्म मिलता है। मनुष्य-देह पाकर ही मनुष्य अपने उद्धारका उपाय कर सकता है; क्योंकि इसी जन्ममें भले बुरेके विचारकी शक्ति होती है; और योनियोंमें तो पाप-ही-पाप होते हैं; अतः मनुष्य-जन्मको, मामूली बात समझकर, योंही दुनियाबी सुख-भोगोंमें न गँवाना चाहिये। संसारी सुख-भोगोंसे न तो इस दुनियामें सुख-शान्ति मिलती है और न इसके बादकी दुनियामें। इस लोकमें सुख भोगनेवालोंको लाखों बरसों तक घोर दुःख भोगने होते हैं। हाँ, जो लोग इस मनुष्य-देहकी क्रीमत समझ कर, सब संसारी सुखोंको लात मारकर, भगवान् की शरणमें चले जाते हैं और सन्तोष-वृत्ति रखते हैं; वे इस लोक और परलोकमें सदा सुख भोग करते और अन्तमें ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं।
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क्षप्य ।
तुम धनसों सन्तुष्ट, हमहूँ हैं वृक्षबकल तैं । दोज भये समान, नैन मुख धंग सकल तैं । जाने जात दरिद्र, बहुत तृष्णा है जिनके । जिनके तृष्णा नाहिं, बहुत सम्पत है तिनके । तुमही विचार देखो हगन, को निर्धन ? धनवन्त को ? जूत पाप कौन ? निष्पापको ? को असन्त और सन्तको ? ॥५०॥
50 We are contented here only with the possession of the bark of trees, whilst thou art content with the possession of wealth. Contentment being the same, the difference between us is equalised, He is always poor whose desires are predominant in his mind while to a contented-man the rich and the poor are all alike
यदेतत्त्वच्छन्दं विहरणभकार्पण्यमशनं सहायैः संवासः श्रुतमुपशमैकत्रतफलम् ॥ मनो मन्दस्पर्न्दं बहिरपि चिरस्यापि विमृश- त्व जाने कस्यैषा परिणतिस्वरस्य तपसः ॥५१॥
हमहूँ हैं = हम भी हैं। वृक्षबकल तैं = पेड़ों की छालोंसे। दोज भये... सकल तैं = दोनों ही आँख और मुँह वगैरः सभी धंगोंसे बराबर हैं। तृष्णा = इच्छा। सम्पत = दौलत। हगन = धाँखों से। को = कौन। जूतपाप = पापयुक्त, पापी। निष्पाप = पाप-रहित। असन्त = दुष्ट ; जूतन। सन्त = सज्जन। को निधन...सन्तको ? = कौन निर्धन और कौन
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स्वाधीनतापूर्वक जीवन अतिवाहित करना, बिना माँगे खाना, विपदमें साहस रखनेवाले मित्रोंकी संगति करना, मनको वशमें करने की तरकीबें बताने वाले शास्त्रोंका पढ़ना-सुनना और चञ्चल चित्तको स्थिर करना—हम नहीं जानते, ये किस पूर्व-तपस्याके फलसे प्राप्त होते हैं ?
पराधीन मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता, उसे पैड़-पैड़ पर अपमानित, लाञ्छित और दुःखित होना पड़ता है। जो स्वाधीन है, किसीके अधीन नहीं है, वे ही सच्चे सुखिया हैं। जिनको अपने पेटके लिये किसीके सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता—किसीके सामने झीन बचन कहने नहीं पड़ते, जिनके दुःसमयमें सहायता देनेवाले, बिना कहे कष्ट निवारण करने वाले मित्र हैं; जो मनको शान्त करनेवाले और उसकी चञ्चलता दूर करनेवाले शास्त्रोंको पढ़ते हैं—वे भाग्यवान् हैं। कह नहीं सकते, उन्होंने ये उत्तम फल पूर्वजन्मके किस कठोर तपसे पाये हैं।
दोहा ।
सत्संगति स्वच्छन्दता, बिना क्रपणता भक्ष ।
जान्यो नहिं किहि तप किए, यह फल होत अत्यन्त ॥४१॥
धनवान् है ? कौन पापी और कौन पाप-रहित है ? कौन हुज्रन् और कौन सज्जन है ?
सत्संगति = सज्जनोंकी संगति, शरीरों की सहचरता । स्वच्छन्दता =
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51. I do not know which austere Tapa practised in the previous existence gives rise to the following fruits:—Living an independent life, dining without begging for food, company of friends ready to help in difficulty, listening to Shastras in such a way as will enable one to prepare for the vow of self-control, the slackening of mental restlessness and even when the mind grows restless, trying to restrain it by thoughtful consideration.
पाणिः पावं पवित्रं भ्रमणपरिगतं भैक्ष्यमक्षय्यमन्नं
विस्तीर्णं वस्त्रमाशासुदशकमलं तल्पमस्त्वपसुर्वी ॥
येषां निःसंगतांगीकरणपरिणतिः स्वात्मसन्तोषिणस्ते
धन्याः संन्यस्तेदेन्यव्यतिकरनिकराः कर्मनिर्गल्यन्ति ॥५२॥
वे ही प्रशंसाभाजन हैं, वे ही धन्य हैं, उन्हेंनोने ही कर्मकी जड़ काट दी है—जो अपने हाथोंके सिवा और किसी वासन की जरूरत नहीं समझते, जो घूम-घूमकर भिक्षाका अन्न खाते हैं, जो दशो-दिशाओं को ही अपना विस्तृत वस्त्र समझते हैं, जो सारी पृथ्वी का ही अपनी निर्मल शय्या समझते हैं, जो अकेले रहना पसन्द करते हैं, जो दीनतासे घृणा करते हैं और जिन्होंने आत्मामें ही सन्तोष कर लिया है ॥५२॥
जिन्होंने सबसे मन हटा कर, सब तरहके विषयोंको त्याग कर, संसारी माया-जाल काट कर, अपने आत्मामें ही सन्तोष
स्वतन्त्रता, आज़ादी। भक्त=खाना, भोजन। जान्यो नहिं=नहीं जानता। किहि तप किष्ट=कौनता तप करेते। इत प्रत्यक्ष=सिद्धते हैं।
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कर लिया है, जो किसी भी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रखते, यहाँ तक कि जल पीनेको भी कोई बर्तन पास नहीं रखते; अपने हाथोंसे ही बर्तनका काम ले लेते हैं; खानेके लिये घर में सामान नहीं रखते, कलके भोजनकी फिक नहीं करते, आज इस गाँवमें माँगकर पेट भर लेते हैं तो कल दूसरे गाँव में जा माँगते हैं, एक गाँवमें दो रात नहीं बिताते; जो शरीर ढकनेके लिये कपड़ोंको भी ऊरुरत नहीं रखते, दूधों दिसाओंको ही अपना वस्त्र समझते हैं; जो पलंग-तोशक और गहूँ तकियोंकी आवश्यकता नहीं समझते, ज़रासी ज़मीनको ही निर्मल पलंग समझते हैं; जब नींद आती है, अपने हाथका तकिया लगाकर सो जाते हैं; जो किसीका सद्गुरु नहीं करते, अकेले रहते हैं, बैराग्यमें ही परमानन्द समझते हैं; जो किसीके सामने दीनता नहीं करते—अथवा दैन्यरूपी व्यसनोंसे घृणा करते और अपने स्वरूपमें ही मगन रहते हैं, वे पुरुष सचमुच ही महापुरुष हैं। ऐसे पुरुषरत्न धन्य हैं ! उन्होंने सचमुच ही कर्म-बन्धन काट दिया है। वे ही सच्चे त्यागी और संन्यासी हैं। ऐसेही महापुरुषोंके सम्बन्धमें महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है—
काम ही न क्रोध जाके, लोभ ही न मोह ताके ।
मद ही न मत्सर, न कोज न विकारो है ॥
दुःख ही न सुख माने, मग्न ही न पुराय जाने ।
हरष न शोक धाने, देह ही तें न्यारो है ॥
( १७४ )
निन्दा न प्रशंसा करै, राग ही न द्वेष धरै । लेन ही न देन जाके, कुछ न पसरो है ॥ सुन्दर कहत, ताकी अगम अगाध गति । ऐसो कोउ साधु, सोतो रामजी कूँ प्यारो है ॥
जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर प्रभृति विचार नहीं हैं; जो दुःख-सुख और पाप-पुण्यको नहीं जानता; जिसे न खुशो होती है और न रञ्ज; जो अपने शरीर से अलग है; जो न किसीकी तारीफ़ करता है और न किसी की बुराई करता है; जिसे न किसीसे प्रेम है और न किसी से वैर है; जिसका न किसीसे छेना है और न किसीको देना है; न और ही किसी तरहका व्यवहार है। सुन्दरदास कहते हैं, ऐसे मनुष्यकी गति अगम्य और अगाध है। उसकी गहराईका पता नहीं। ऐसा ही महापुरुष भगवान्को प्यारा लगता है।
छप्पय ।
भोजनकों कर पट, दशों दिशि बसन बनाये । भखै भीखको अब्र, पल्लंग पृथ्वी पर छाये । छाँड़ि सबनको संग, अकेले रहत रैन दिन । नित आतस सों लीन, पौन सन्तोष छिनाहिं छिन ।
कर=हाथ। दशोंदिशि=धरब; पच्छिम आदि दश दिशाएँ। बसन=कपड़। भखै=खावे, खाता है। छाँड़ि सबनको संग=छो पुत्र आदिको
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मनको विकार, इन्द्रीनको डारै तोर मरोर जिन ।
वे धन्य २ संन्यास धन , कर्म किये निर्मूल तिन ॥५२॥
52. Praiseworthy are those and they alone who cut down the roots of Karma, who do not need any other vessel but their own hands for the purposes of drinking water etc, who eat only the food procured by leading the life of a wandering mendicant, who consider the endless space to be the only fit garments for them, who have the wide earth alone for their bed and whose mind has been trained into the habit of non-attachment by practising self-contentment.
दुराराध्यः स्वामी तुरगचलचिताः चित्तिशुजो
वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः ।
जरा देहं मृत्युहरति सकलं जीवितमिदं
सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषोऽन्यत्र तपसः ॥५३॥
मालिकको राजी करना कठिन है। राजाओंके दिल छोड़ों के समान चञ्चल होते हैं। इधर हमारी इच्छाएँ बड़ी भारी हैं; उधर हम बड़े भारी पद—मोक्षके अभिलाषी हैं। बुढ़ापा शरीर को निकम्मा करता है और मृत्यु जीवन को नाश करती है। इसलिये हे मित्र ! बुद्धिमान्के लिये, इस जगत्में, तपसे बढ़कर और कल्याण-का मार्ग नहीं है ॥५३॥
छोड़कर। रैनदिन=रात-दिन। * नित=नित्य। ब्रातम=ब्रातमा। निर्मूल=जड़ रहित। तिन=उन्होंने।
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सेवा-धर्म बड़ा कठिन है। हजारों प्रकारकी सेवायें करने, अनेक प्रकार की हाँ-में-हाँ मिलाने, दिनको रात और रातको दिन कहने, तरह-तरहकी खुशामदे करनेसे भी मालिक कभी सन्तुष्ट नहीं होता। राजाओंके दिल अशिक्षित घोड़ोंकी तरह चंचल होते हैं। उनके चित्त स्थिर नहीं रहते; ज़रासी देरमें वे प्रसन्न होते और ज़रासी देरमें अप्रसन्न हो जाते हैं; क्षणभरमें गाँव-के-गाँव बरुशते और क्षण-भरमें शूली पर चढ़वाते हैं, इसलिये राजसेवामें बड़ा ख़तरा है। उसमें ज़रा भी सुख नहीं, यहाँतक कि जानकी भी ख़ैर नहीं है। एक तरफ तो हमारी इच्छाओं और हमारे मनोरथोंकी सीमा नहीं है; दूसरी ओर हम परमपदके अभिलाषी हैं; इस लिये यहाँ भी मेल नहीं खाता। बुढ़ापा हमारे शरीरको निर्वल और रूपको कुरूप करता एवं सामर्थ्य और बलका नाश करता है तथा मृत्यु खिरपर मँडराती है। ऐसी दशामें मित्रवर ! कहीं सुख नहीं है। अगर सुख—सच्चा सुख चाहते हो, तो परमात्मा का भजन करो। उससे आपके इहलोक और परलोक दोनों सुधरेंगे, आप जन्म-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर मोक्ष-पद पायेंगे। सारांश यह है, कि सच्चा और नित्य सुख केवल वैराग्य और इश्वर-भक्तिमें है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं।
“तुलसी” मिटै न कल्पना, गये कल्पतरु-छाँह ।
जब लगि द्वै न करि कृपा, जनक-सुता को नाह ॥
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हित सन हित—रति राम सन, रिपु सन वैर विहाय ।
उदासीन संसार सन, “तुलसी” सहज सुभाय ॥
मनुष्य चाहे कल्पवृक्षके नीचे क्यों न चला जाय, जबतक स्तीतापतिकी रूपान न होगी तब तक उसके दुःखोंका नाश नहीं हो सकता ; इसलिये शत्रुता-मित्रता छोड़, संसारसे उदासीन हो, भगवान्से प्रीति करो ।
खुलासा—कहते हैं, इन्द्रके बगीचेमें एक पेसा वृक्ष है, जिसकी छायामें जाकर मनुष्य या देवता जो बीज चाहते हैं, वही उनके पास आप-से-आप आजाती है । उसी वृक्षको “कल्प-वृक्ष” कहते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, जब तक जानकी-नाथ रामचन्द्रजी दया करके प्रसन्न न हों तब तक, मनुष्यकी कल्पना, कल्पवृक्षकी छायामें जानसे भी, नहीं मिट सकती ।
जप, तप, तीर्थ, व्रत, शम, दम, दया, सत्य, शौच और दान वगैरः काम अगर मनमें वासना रखकर किये जाते हैं; यानी करनेवाला यदि उनका फल या पुरस्कार चाहता है, तो उसे स्वर्गादि मिलते हैं । स्वर्गमें जाने से मनुष्यका आवागमन—इस दुनियामें आना और यहाँसे फिर जाना—पैदा होना और मरना—नहीं बन्द हो सकता । क्योंकि कहा है—“पुण्ये क्षीणे मृत्युलोकै” अर्थात् पुण्योंके क्षीण होते ही फिर स्वर्गसे मृत्यु लोकमें आना पड़ता है । उपरोक्त जप-तप आदिसे स्वर्ग तो मिलता है, पर मनुष्यका असल मकसद पूरा नहीं होता ; यानी उसे परमपद या मोक्ष नहीं
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मिलती । इसलिये मनुष्यको निष्काम कर्म करने चाहिये ॐ शवा सारे कर्म भगवान्की प्रीतिके लिए करने चाहिये । “गीता”में भी यही बात भगवान् कृष्णने कही है । बहुत लिखनेसे क्या —भगवान्की भक्ति सर्वोपरि है । भगवान्की भक्तिये जो काम हो सकता है, वह घोर-से-घोर तपस्याओंसे भी नहीं हो सकता । किसीने कहा है :—
पठित सकल वेदशास्त्रलपारंगतो वा
यम नियम परो वा धर्मशास्त्रार्थकृद्वा ।
अटित सकल तीर्थत्राजको वाहिताग्निनिहि
हदि यदि रामः सर्वभैततृष्ठा स्यात् ॥
चाहे सारे वेद-शास्त्रोंको पढ़ लो, चाहे यम नियम आदि कर लो, चाहे धर्मशास्त्रको मनन कर लो और चाहे सारे तीर्थ कर लो, अगर आपके दिलमें राम नहीं है, तो ये सब वृथा हैं ।
इसीलिये तुलसीदासजी कहते हैं, कि दोस्तोंसे दोस्ती और दुश्मनोंसे दुश्मनी छोड़कर एवं संसारसे उदासीन होकर भगवान्से प्रीति करो । मतलब यह है, कि न किसीसे राम करो और न किसीसे द्वेष ; सबको उदासीन होकर देखो । जब आपका दिल राम-द्वेष आदिये शुद्ध होगा—इस दुनियामें न कोई आपका प्यारा होगा और न कोई कुप्यारा ; तभी आपका दिल एक भगवान्में लगेगा ।
( १७६ )
अहारभा सुन्दरदासजी कहते हैं :—
( १ )
काहे कैं फिरत नर ! दीन भयो घर-घर ।
देखियत, तेरा तो आहार इक सेर है ॥
जाको देह सागर में, सुन्यो शत योजन को ।
ताहूँ कैं तो देत प्रभु, यामें नहिं फेर है ॥
भूखो कोउ रहत न, जानिये जगत माहिं ।
कीरी अर कुम्भर, सबन ही कैं देत है ॥
“सुन्दर” कहत, विश्वास कयँ न राखे शठ ! ।
बेर-बेर समझाय, कहाँ केती बेर है ॥१॥
( २ )
काहे कैं दौरत है दशहूँ दिशि ?
तू नर ! देख कियो हरिज् को ।
बेठि रहै दुखिके मुख मुँदि,
उधारत दौत खवाइहि ठूको ।
गर्भ थके प्रतिपाल करी जिन,
हेइ र्हो तनहीं जड़ मूको ।
“सुन्दर” कयँ बिलात फिरे अन्र !
राख हदे विश्वास प्रभु को ॥२॥
( ३ )
हे पुरुष ! तू दीन होकर कयों घर-घर मारा-मारा फिरता है ? हैब, तेरा पेट तो एक सिर आठमें भर जाता है ! सुनते
( १८० )
है, समुद्रमें जिसका शरीर बार सौ कोस लम्बा-चौड़ा है, उसको भी प्रभु भोजन पहुँचाते हैं, इसमें जरा भी शक नहीं। संसारमें कोई भी भूखा नहीं रहता। वह जगदीश चींटी और हाथी सबका पेट भरते हैं। अरे शठ! विश्वास क्यों नहीं रखता? सुन्दरदासजी कहते हैं, मैंने तुझे यह बात बारम्बार कितनी बार नहीं समझाई है?
( २ )
अरे! तू दशों दिशाओंमें क्यों भागा फिरता है? तू भगवान्के किये हुए कामोंका खयाल कर। देख, जब तू मुँह बन्द किये हुए छिपा बैठा था, तब भी तुझे खानेको पहुँचाया और जब तेरे दाँत आ गये तब भी तुझे तेरे मुँह खोलते ही खानेको टुकड़ दिया। जिस प्रभुने तेरी गर्भावस्थासे ही—जबकि तू जड़ और मूक था—पालना की है, वही क्या अब तेरी खबर न लेगा? सुन्दरदासजी कहते हैं, तू क्यों चीखता फिरता है? भगवान्का भरोसा रख; वही प्रभु अब भी तेरो पालना करेंगे।
सारंश यह, कि बुद्धिमानको दुनियाके घमण्डी लोगों की खुशामद छोड़, केवल उसकी खुशामद और नौकरी करनी चाहिये, जिसके दिलमें न घमण्ड है और न क्रूरता। जो उसकी शरणमें जाता है, उसीकी वह अवश्य प्रतिपालना करता और उसके दुःख दूर करनेको हाज़र हुज़ूर खड़ा रहता है। मनुष्य! तेरी जिन्दगी अढ़ाई मिनटकी है। इस अढ़ाई मिनटकी
( १८१ )
जिन्दगीको बुथा बर्बाद न कर । इसे क्षतम होते देर न लगेगी । राजाओं और अमीरोंकी सेवा-दृढ़ल और लल्लो-चप्पो में यह शीघ्र ही पूरी हो जायगी और उनसे तेरी कामना भी सिद्ध न होगी । यदि तू सबका आसरा छोड़, जगदीशकी ही चाकरी करेगा ; तो निश्चय ही तेरा भला होगा—तेरे दुःखों का अवसान हो जायगा ; तुम्हें फिर जन्म लेकर घोर कष्ट न सहने होंगे ; तुझे नित्य और चिरखायी शान्ति मिलेगी । अरे ! तू सारी चतुराई और बालाकियोंको छोड़कर, एक इस चतुराईको कर ; क्योंकि यही चातुरी सच्ची चातुरी है । जो जगदीशको प्रसन्न कर लेता है, वही सच्चा चतुर है ।
कहा है :—
या राका शशि-शोभना गतवना सा यामिनी यामिनी ।
या सौन्दर्य-गुणान्विता पतिरता सा कामिनी कामिनी ॥
या गोविन्द-रस-प्रभेद मधुरा सा माधुरी माधुरी ।
या लोकद्वय साधनी तनुभूतौ सा चातुरी चातुरी ॥
मेघावरणशून्य पूर्ण-चन्द्रमासे शोभायमान जो रात्रि है, वही रात्रि है । जो सुन्दरी है, गुणवती है और पतिमें भक्ति रखनेवाली है, वही कामिनी है । कृष्णके प्रेमके आनन्दसे मनोहर मधुरता ही मधुरता है । शरीरधारियोंका दोनो लोकोंमें उपकार करनेवाली जो चतुराई है, वही चतुराई है ।
( ३८२ )
दोहा ।
रूप-सेवामें तुच्छ फल, बुरी कालकी व्याधि ।
अपनोहित चाहत कियो, तौ तू तप आराधि ॥५२॥
53. Masters are not easily pleased and kings are restless in mind like untrained horses. We have great desires while we still cherish in our mind the hope of reaching the great goal of salvation. The body is susceptible to old age and life itself is liable to be destroyed by Death. O friend, there is no better thing in this world for a wise man than practising Penance.
भोगा मेघवितानमव्यचिलसत्सौदाभिनीचञ्चला
आयुर्वान्युविघट्टिताश्रपटलीलीनाम्बुवहङ्गुरम् ॥
लोला यौवनलालसा तन्मृताभित्याकलय द्रुत
योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विद्वन् बुधाः ॥५४॥
देहधारियोंके भोग—विषय-सुख—सघन बादलोंमें चमकनेवाली बिजली की तरह चञ्चल हैं ; मनुष्यों की आयु या उम्र हवासे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके जलके समान क्षणस्थायी या नाशमान् हैं और जवानी की उम्र भी स्थिर नहीं है । इसलिये बुद्धिमानो ! धैर्यसिं चित्तको एकाग्र करके, उसे योगसाधन में लगाओ ॥५४॥
संसार और संसारके सारे पदार्थ नाशमान् और असार हैं ।
रूप-सेवा = राज-सेवा, राजाओंकी चाकरी । काल = मृत्यु = मौत । हित = भलाई । तप आराधि = तपस्या कर ।
( १८३ )
यहाँ जो दिखाई देता है वह स्थिर न रहेगा। यह जो अथाह जलसे भरा हुआ समन्दर दिखाई देता है, किसी दिन मरुस्थल में परिणत हो जायगा; पानीकी एक बूँद भी नहीं मिलेगी। यह बागीचा, जो आज इन्द्रके बगीचेकी बराबरी कर रहा है, जिसमें हजारों तरहके फूलोंके वृक्ष लग रहे हैं, होज बने हुए हैं, छोटी-छोटी नहरें कटी हुई हैं, संगमरमर और संगमूसाके चबूतरें बने हुए हैं, बीचमें इन्द्र-भवनके जैसा महल खड़ा है, किसी दिन उजाड़ हो जायगा; इसमें स्यार, लोमड़ी और ज़रख प्रभृति पशु बसेरा लेंगे। यह जो सामने महलोंकी नगरी (City of Palaces) दीखती है, जिसमें हजारों दुर्मज्जिले, तिमज्जिले, चौमज्जिले और सतमज्जिले आलीशान मकान खड़े हुए आकाश को चूम रहे हैं, जहाँ लाखों मनुष्योंके आने-जाने और काम-धन्या करनेके कारण पीठ-से-पीठ छिलती है, किसी दिन यहाँ घोर भयानक वन हो जायगा। मनुष्योंके स्थानमें सिंह, बाघ, हाथी, गेंडे, हिरन और स्यार प्रभृति पशु आ बसेंगे। और तो क्या—यह सूर्य, जो अपने तेजसे तीनों लोकमें प्रकाश फैलाता है, अन्धकार-रूप हो जायगा। यह अमृतसे पूर्ण सुधाकर—चन्द्रमा भी शून्य हो जायगा। इसकी शीतल चाँदनी न जान कहीं विलीन हो जायगी? हिमालय और सुमेरु जैसे पर्वत एक दिन मिट्टीमें मिल जायेंगे। यह ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी शून्य हो जायेंगे। सारा जगत् नाश हो जायगा। ये स्त्री पुत्र और नाते-रिश्तेदार न जाने कहीं छिप जायेंगे? युगोंको
( १८४ )
सहस्र चौकड़ियोंका ब्रह्माका एक दिन होता है। उस दिन के पूरे होते ही प्रलय होती है। तब इस जगत्की रचना करने वाला ब्रह्मा भी नाश हो जाता है। आज तक अनगिन्ती ब्रह्मा हुए। उन्होंने जगत्की रचना की और अन्तमें स्वयं नष्ट हो गये। जब हमारे पैदा करनेवालेका यह हाल है, तब हमारी क्या गिन्ती ?
यह काया,—जिसे मनुष्य अपना सर्वस्व समझता है, जिसे मल-मल कर धोता, इत्र-फुलेलोंसे सुवासित करता, नाना प्रकारके रत्नजटित मनोहर गहने पहनता, कष्टसे बचने और सुखो होनेके लिये नरम-नरम मलमली गहनोंपर सोता, पैरों को तुकलीफसे बचानेके लिये जोड़ी-गाड़ी या मोटरमें चढ़ता है,—एक दिन नाश हो जायगी ; पाँच तत्वोंसे बनी हुई काया पाँच तत्वोंमें ही लीन हो जायगी। जिस तरह पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद क्षणस्थायी होती है ; उसी तरह यह काया क्षणभंगुर है। दीपक और बिजलीका प्रकाश आता-जाता दीखता है, पर इस कायाका आदि-अन्त नहीं दीखता। यह काया कहाँसे आता है और कहाँ जाता है ? जिस तरह समुद्र में बुदबुदे उठते और मिट जाते हैं, उसी तरह शरीर बनते और क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। सच तो यह है कि, यह शरीर बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह चंचल और अस्थिर है। जिस दिन जन्म लिया, उसी दिन मौत पीछे पड़ गई ; अब वह अपना समय देखती है और समय पूर्ण होते ही प्राणीको नष्ट कर देती है।
( १८५ )
जिस तरह जलकी तरंगें उठ-उठकर नष्ट हो जाती हैं ; उसी तरह लक्ष्मी आकर क्षणमें विलीन हो जाती है। जिस तरह विजली चमककर गायब हो जाती है ; उसी तरह लक्ष्मी दशन देकर गायब हो जाती है। हवा और चपलाको रोकना अत्यन्त कठिन है, पर शायद कोई उन्हें रोक सके ; आकाशका चूर्ण करना अतीव कठिन है, पर शायद कोई आकाशको भी चूर्ण करनेमें समर्थ हो जाय ; समुद्रको भुजाओंसे तैरना बहुत कठिन है, पर शायद कोई तैरकर उसे भी पार कर सके ; इतने असम्भव काम शायद कोई सामर्थ्यवान् करले, पर चंचला लक्ष्मी को कोई भी स्थिर नहीं कर सकता। जिस तरह अंजलि में जल नहीं ठहरता ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसीके पास नहीं ठहरती। जिस तरह वेश्या एक पुरुषसे राजी नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको चाहती है ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसी एकके पास नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको भजती है। इसीसे लक्ष्मी और वेश्या दोनोंको ही चपला कहते हैं।
जिस तरह सार्वसारिक पदार्थ लक्ष्मी और विषय-भोग तथा आयु चञ्चल और क्षणस्थायी हैं, उसी तरह यौवन या जवानों भी क्षणस्थायी हैं। जवानों आते दीखती है, पर जाते मालूम नहीं होती। हवाकी अपेक्षा भी तेज चालसे दिन-रात होते हैं और उसी तेजीसे जवानी भ्रष्ट क्षतम हो जाती और बुढ़ापा आ जाता है। उस समय विस्मय सा होने लगता है। यह
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शरीर तभी तक सुन्दर और मनोहर लगता है, जब तक बुढ़ापा नहीं आता। बुढ़ापा आते ही वह उछल-कूद, वह अकड़-तकड़, वह चमक-दमक, वह सुखों, वह छातियोंका उभार, वह नयनोंका रसीलापन न जाने कहाँ गायब हो जाता है। असलमें यौवनके लिये बुढ़ापा राहु है। जिस तरह चन्द्रमाको जब तक राहु नहीं ग्रसता, तभीतक प्रकाश रहता है; उसी तरह जब तक बुढ़ापा नहीं आता, तभी तक शरीरका सोन्दर्य और रूप-लावण्य बना रहता है। प्राणियोंको बाल्यावस्थाके बाद युवावस्था और युवावस्थाके बाद वृद्धावस्था अवश्य आती है। युवावस्था सदा नहीं रहती; अच्छी तरह गहरा विचार करने से जवानी क्षण-भरकी मालूम होती है।
संसारमें जो नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे मनभावन पदार्थ दिखाई देते हैं, ये सभी नाशमान् हैं। ये सब वास्तवमें कुछ भी नहीं; केवल मनकी कल्पनासे इनकी सृष्टि की गई है। मूर्ख ही इनमें आस्था रखते हैं, ज्ञानी नहीं।
इस जगत्में ज्ञानीका जीवन सार्थक और अज्ञानीका निरर्थक है। अज्ञानीके जीनेसे कोई लाभ नहीं। उसके जीनेसे अर्थ-सिद्धि नहीं होती। वह वृथा सुअवसर गँवाता है। मूर्ख मोहके मारे नहीं समझता, कि ऐसा मौका बड़ी मुश्किलसे मिला है। इस बार चूके तो ख़ैर नहीं। अज्ञानी अपनी अज्ञानता या मोहके कारण ही नाशमान् और दुःखके मूल विषयोंकी ओर दौड़ता है; पर आयु, यौवन और विषयों-
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की क्षणभंगुरता पर ध्यान नहीं देता । यह मायामोह नहीं तो क्या है ? “सुभाषितावलि”में लिखा है :—
चला विभूतिः क्षणभंगी यौवनं
कृतान्तदन्तान्तवर्त्ति जीवितम् ।
तथाप्यवज्ञा परलोकसाधने
गुणाम्हेा विस्मयकारि चैष्टितम् ।
विभूति चञ्चल है, यौवन क्षणभंगुर है, जीवन कालके दांतोंमें है ; तोभी लोग परलोक-साधनको परवा नहीं करते । मनुष्योंको यह चेष्टा विस्मयकारक है !
फिरदौसोने “शाहनामे”में कहा है :—“मनुष्य इस नापायेदार दुनियाँसे क्यों दिल लगाते हैं ; जबकि मौतका नक्शा दूरवाजे पर बज रहा है ?”
मनुष्यो ! होश करो, गफ़लतकी नींद छोड़ो । वह देखो ! मौत आपका द्वार खट-खटा रही है । अब तो मिथ्या संसारका मोह त्यागो । ये जो स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, माता-पिता आदिक प्यारे और सम्बन्धी दिखाई देते हैं, ये उसी वक्त तक हैं, जब तक कि शरीर नाश नहीं हुआ है । शरीरके नाश होते ही ये नज़र भी न आयेंगे । यह भी समझमें न आवेगा कि, कहाँ गये और कहाँसे आये थे । यह बन्धु-बान्धवोंका मिलना, उन बातियों या मुसाफ़िरोंकी त्मह है, जो भिन्न-भिन्न स्थानों से सफ़र करते हुए एक वृक्षके नीचे आकर ठहर जाते हैं और