भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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की क्षणभंगुरता पर ध्यान नहीं देता । यह मायामोह नहीं तो क्या है ? “सुभाषितावलि”में लिखा है :—

चला विभूतिः क्षणभंगी यौवनं

कृतान्तदन्तान्तवर्त्ति जीवितम् ।

तथाप्यवज्ञा परलोकसाधने

गुणाम्हेा विस्मयकारि चैष्टितम् ।

विभूति चञ्चल है, यौवन क्षणभंगुर है, जीवन कालके दांतोंमें है ; तोभी लोग परलोक-साधनको परवा नहीं करते । मनुष्योंको यह चेष्टा विस्मयकारक है !

फिरदौसोने “शाहनामे”में कहा है :—“मनुष्य इस नापायेदार दुनियाँसे क्यों दिल लगाते हैं ; जबकि मौतका नक्शा दूरवाजे पर बज रहा है ?”

मनुष्यो ! होश करो, गफ़लतकी नींद छोड़ो । वह देखो ! मौत आपका द्वार खट-खटा रही है । अब तो मिथ्या संसारका मोह त्यागो । ये जो स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, माता-पिता आदिक प्यारे और सम्बन्धी दिखाई देते हैं, ये उसी वक्त तक हैं, जब तक कि शरीर नाश नहीं हुआ है । शरीरके नाश होते ही ये नज़र भी न आयेंगे । यह भी समझमें न आवेगा कि, कहाँ गये और कहाँसे आये थे । यह बन्धु-बान्धवोंका मिलना, उन बातियों या मुसाफ़िरोंकी त्मह है, जो भिन्न-भिन्न स्थानों से सफ़र करते हुए एक वृक्षके नीचे आकर ठहर जाते हैं और

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