वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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शरीर तभी तक सुन्दर और मनोहर लगता है, जब तक बुढ़ापा नहीं आता। बुढ़ापा आते ही वह उछल-कूद, वह अकड़-तकड़, वह चमक-दमक, वह सुखों, वह छातियोंका उभार, वह नयनोंका रसीलापन न जाने कहाँ गायब हो जाता है। असलमें यौवनके लिये बुढ़ापा राहु है। जिस तरह चन्द्रमाको जब तक राहु नहीं ग्रसता, तभीतक प्रकाश रहता है; उसी तरह जब तक बुढ़ापा नहीं आता, तभी तक शरीरका सोन्दर्य और रूप-लावण्य बना रहता है। प्राणियोंको बाल्यावस्थाके बाद युवावस्था और युवावस्थाके बाद वृद्धावस्था अवश्य आती है। युवावस्था सदा नहीं रहती; अच्छी तरह गहरा विचार करने से जवानी क्षण-भरकी मालूम होती है।
संसारमें जो नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे मनभावन पदार्थ दिखाई देते हैं, ये सभी नाशमान् हैं। ये सब वास्तवमें कुछ भी नहीं; केवल मनकी कल्पनासे इनकी सृष्टि की गई है। मूर्ख ही इनमें आस्था रखते हैं, ज्ञानी नहीं।
इस जगत्में ज्ञानीका जीवन सार्थक और अज्ञानीका निरर्थक है। अज्ञानीके जीनेसे कोई लाभ नहीं। उसके जीनेसे अर्थ-सिद्धि नहीं होती। वह वृथा सुअवसर गँवाता है। मूर्ख मोहके मारे नहीं समझता, कि ऐसा मौका बड़ी मुश्किलसे मिला है। इस बार चूके तो ख़ैर नहीं। अज्ञानी अपनी अज्ञानता या मोहके कारण ही नाशमान् और दुःखके मूल विषयोंकी ओर दौड़ता है; पर आयु, यौवन और विषयों-