वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८५ )
जिस तरह जलकी तरंगें उठ-उठकर नष्ट हो जाती हैं ; उसी तरह लक्ष्मी आकर क्षणमें विलीन हो जाती है। जिस तरह विजली चमककर गायब हो जाती है ; उसी तरह लक्ष्मी दशन देकर गायब हो जाती है। हवा और चपलाको रोकना अत्यन्त कठिन है, पर शायद कोई उन्हें रोक सके ; आकाशका चूर्ण करना अतीव कठिन है, पर शायद कोई आकाशको भी चूर्ण करनेमें समर्थ हो जाय ; समुद्रको भुजाओंसे तैरना बहुत कठिन है, पर शायद कोई तैरकर उसे भी पार कर सके ; इतने असम्भव काम शायद कोई सामर्थ्यवान् करले, पर चंचला लक्ष्मी को कोई भी स्थिर नहीं कर सकता। जिस तरह अंजलि में जल नहीं ठहरता ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसीके पास नहीं ठहरती। जिस तरह वेश्या एक पुरुषसे राजी नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको चाहती है ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसी एकके पास नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको भजती है। इसीसे लक्ष्मी और वेश्या दोनोंको ही चपला कहते हैं।
जिस तरह सार्वसारिक पदार्थ लक्ष्मी और विषय-भोग तथा आयु चञ्चल और क्षणस्थायी हैं, उसी तरह यौवन या जवानों भी क्षणस्थायी हैं। जवानों आते दीखती है, पर जाते मालूम नहीं होती। हवाकी अपेक्षा भी तेज चालसे दिन-रात होते हैं और उसी तेजीसे जवानी भ्रष्ट क्षतम हो जाती और बुढ़ापा आ जाता है। उस समय विस्मय सा होने लगता है। यह