वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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सहस्र चौकड़ियोंका ब्रह्माका एक दिन होता है। उस दिन के पूरे होते ही प्रलय होती है। तब इस जगत्की रचना करने वाला ब्रह्मा भी नाश हो जाता है। आज तक अनगिन्ती ब्रह्मा हुए। उन्होंने जगत्की रचना की और अन्तमें स्वयं नष्ट हो गये। जब हमारे पैदा करनेवालेका यह हाल है, तब हमारी क्या गिन्ती ?
यह काया,—जिसे मनुष्य अपना सर्वस्व समझता है, जिसे मल-मल कर धोता, इत्र-फुलेलोंसे सुवासित करता, नाना प्रकारके रत्नजटित मनोहर गहने पहनता, कष्टसे बचने और सुखो होनेके लिये नरम-नरम मलमली गहनोंपर सोता, पैरों को तुकलीफसे बचानेके लिये जोड़ी-गाड़ी या मोटरमें चढ़ता है,—एक दिन नाश हो जायगी ; पाँच तत्वोंसे बनी हुई काया पाँच तत्वोंमें ही लीन हो जायगी। जिस तरह पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद क्षणस्थायी होती है ; उसी तरह यह काया क्षणभंगुर है। दीपक और बिजलीका प्रकाश आता-जाता दीखता है, पर इस कायाका आदि-अन्त नहीं दीखता। यह काया कहाँसे आता है और कहाँ जाता है ? जिस तरह समुद्र में बुदबुदे उठते और मिट जाते हैं, उसी तरह शरीर बनते और क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। सच तो यह है कि, यह शरीर बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह चंचल और अस्थिर है। जिस दिन जन्म लिया, उसी दिन मौत पीछे पड़ गई ; अब वह अपना समय देखती है और समय पूर्ण होते ही प्राणीको नष्ट कर देती है।