वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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यहाँ जो दिखाई देता है वह स्थिर न रहेगा। यह जो अथाह जलसे भरा हुआ समन्दर दिखाई देता है, किसी दिन मरुस्थल में परिणत हो जायगा; पानीकी एक बूँद भी नहीं मिलेगी। यह बागीचा, जो आज इन्द्रके बगीचेकी बराबरी कर रहा है, जिसमें हजारों तरहके फूलोंके वृक्ष लग रहे हैं, होज बने हुए हैं, छोटी-छोटी नहरें कटी हुई हैं, संगमरमर और संगमूसाके चबूतरें बने हुए हैं, बीचमें इन्द्र-भवनके जैसा महल खड़ा है, किसी दिन उजाड़ हो जायगा; इसमें स्यार, लोमड़ी और ज़रख प्रभृति पशु बसेरा लेंगे। यह जो सामने महलोंकी नगरी (City of Palaces) दीखती है, जिसमें हजारों दुर्मज्जिले, तिमज्जिले, चौमज्जिले और सतमज्जिले आलीशान मकान खड़े हुए आकाश को चूम रहे हैं, जहाँ लाखों मनुष्योंके आने-जाने और काम-धन्या करनेके कारण पीठ-से-पीठ छिलती है, किसी दिन यहाँ घोर भयानक वन हो जायगा। मनुष्योंके स्थानमें सिंह, बाघ, हाथी, गेंडे, हिरन और स्यार प्रभृति पशु आ बसेंगे। और तो क्या—यह सूर्य, जो अपने तेजसे तीनों लोकमें प्रकाश फैलाता है, अन्धकार-रूप हो जायगा। यह अमृतसे पूर्ण सुधाकर—चन्द्रमा भी शून्य हो जायगा। इसकी शीतल चाँदनी न जान कहीं विलीन हो जायगी? हिमालय और सुमेरु जैसे पर्वत एक दिन मिट्टीमें मिल जायेंगे। यह ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी शून्य हो जायेंगे। सारा जगत् नाश हो जायगा। ये स्त्री पुत्र और नाते-रिश्तेदार न जाने कहीं छिप जायेंगे? युगोंको