भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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दोहा ।

रूप-सेवामें तुच्छ फल, बुरी कालकी व्याधि ।

अपनोहित चाहत कियो, तौ तू तप आराधि ॥५२॥

53. Masters are not easily pleased and kings are restless in mind like untrained horses. We have great desires while we still cherish in our mind the hope of reaching the great goal of salvation. The body is susceptible to old age and life itself is liable to be destroyed by Death. O friend, there is no better thing in this world for a wise man than practising Penance.

भोगा मेघवितानमव्यचिलसत्सौदाभिनीचञ्चला

आयुर्वान्युविघट्टिताश्रपटलीलीनाम्बुवहङ्गुरम् ॥

लोला यौवनलालसा तन्मृताभित्याकलय द्रुत

योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विद्वन् बुधाः ॥५४॥

देहधारियोंके भोग—विषय-सुख—सघन बादलोंमें चमकनेवाली बिजली की तरह चञ्चल हैं ; मनुष्यों की आयु या उम्र हवासे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके जलके समान क्षणस्थायी या नाशमान् हैं और जवानी की उम्र भी स्थिर नहीं है । इसलिये बुद्धिमानो ! धैर्यसिं चित्तको एकाग्र करके, उसे योगसाधन में लगाओ ॥५४॥

संसार और संसारके सारे पदार्थ नाशमान् और असार हैं ।

रूप-सेवा = राज-सेवा, राजाओंकी चाकरी । काल = मृत्यु = मौत । हित = भलाई । तप आराधि = तपस्या कर ।