भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १८१ )

जिन्दगीको बुथा बर्बाद न कर । इसे क्षतम होते देर न लगेगी । राजाओं और अमीरोंकी सेवा-दृढ़ल और लल्लो-चप्पो में यह शीघ्र ही पूरी हो जायगी और उनसे तेरी कामना भी सिद्ध न होगी । यदि तू सबका आसरा छोड़, जगदीशकी ही चाकरी करेगा ; तो निश्चय ही तेरा भला होगा—तेरे दुःखों का अवसान हो जायगा ; तुम्हें फिर जन्म लेकर घोर कष्ट न सहने होंगे ; तुझे नित्य और चिरखायी शान्ति मिलेगी । अरे ! तू सारी चतुराई और बालाकियोंको छोड़कर, एक इस चतुराईको कर ; क्योंकि यही चातुरी सच्ची चातुरी है । जो जगदीशको प्रसन्न कर लेता है, वही सच्चा चतुर है ।

कहा है :—

या राका शशि-शोभना गतवना सा यामिनी यामिनी ।

या सौन्दर्य-गुणान्विता पतिरता सा कामिनी कामिनी ॥

या गोविन्द-रस-प्रभेद मधुरा सा माधुरी माधुरी ।

या लोकद्वय साधनी तनुभूतौ सा चातुरी चातुरी ॥

मेघावरणशून्य पूर्ण-चन्द्रमासे शोभायमान जो रात्रि है, वही रात्रि है । जो सुन्दरी है, गुणवती है और पतिमें भक्ति रखनेवाली है, वही कामिनी है । कृष्णके प्रेमके आनन्दसे मनोहर मधुरता ही मधुरता है । शरीरधारियोंका दोनो लोकोंमें उपकार करनेवाली जो चतुराई है, वही चतुराई है ।