वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जिन्दगीको बुथा बर्बाद न कर । इसे क्षतम होते देर न लगेगी । राजाओं और अमीरोंकी सेवा-दृढ़ल और लल्लो-चप्पो में यह शीघ्र ही पूरी हो जायगी और उनसे तेरी कामना भी सिद्ध न होगी । यदि तू सबका आसरा छोड़, जगदीशकी ही चाकरी करेगा ; तो निश्चय ही तेरा भला होगा—तेरे दुःखों का अवसान हो जायगा ; तुम्हें फिर जन्म लेकर घोर कष्ट न सहने होंगे ; तुझे नित्य और चिरखायी शान्ति मिलेगी । अरे ! तू सारी चतुराई और बालाकियोंको छोड़कर, एक इस चतुराईको कर ; क्योंकि यही चातुरी सच्ची चातुरी है । जो जगदीशको प्रसन्न कर लेता है, वही सच्चा चतुर है ।
कहा है :—
या राका शशि-शोभना गतवना सा यामिनी यामिनी ।
या सौन्दर्य-गुणान्विता पतिरता सा कामिनी कामिनी ॥
या गोविन्द-रस-प्रभेद मधुरा सा माधुरी माधुरी ।
या लोकद्वय साधनी तनुभूतौ सा चातुरी चातुरी ॥
मेघावरणशून्य पूर्ण-चन्द्रमासे शोभायमान जो रात्रि है, वही रात्रि है । जो सुन्दरी है, गुणवती है और पतिमें भक्ति रखनेवाली है, वही कामिनी है । कृष्णके प्रेमके आनन्दसे मनोहर मधुरता ही मधुरता है । शरीरधारियोंका दोनो लोकोंमें उपकार करनेवाली जो चतुराई है, वही चतुराई है ।
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दोहा ।
रूप-सेवामें तुच्छ फल, बुरी कालकी व्याधि ।
अपनोहित चाहत कियो, तौ तू तप आराधि ॥५२॥
53. Masters are not easily pleased and kings are restless in mind like untrained horses. We have great desires while we still cherish in our mind the hope of reaching the great goal of salvation. The body is susceptible to old age and life itself is liable to be destroyed by Death. O friend, there is no better thing in this world for a wise man than practising Penance.
भोगा मेघवितानमव्यचिलसत्सौदाभिनीचञ्चला
आयुर्वान्युविघट्टिताश्रपटलीलीनाम्बुवहङ्गुरम् ॥
लोला यौवनलालसा तन्मृताभित्याकलय द्रुत
योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धि विद्वन् बुधाः ॥५४॥
देहधारियोंके भोग—विषय-सुख—सघन बादलोंमें चमकनेवाली बिजली की तरह चञ्चल हैं ; मनुष्यों की आयु या उम्र हवासे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके जलके समान क्षणस्थायी या नाशमान् हैं और जवानी की उम्र भी स्थिर नहीं है । इसलिये बुद्धिमानो ! धैर्यसिं चित्तको एकाग्र करके, उसे योगसाधन में लगाओ ॥५४॥
संसार और संसारके सारे पदार्थ नाशमान् और असार हैं ।
रूप-सेवा = राज-सेवा, राजाओंकी चाकरी । काल = मृत्यु = मौत । हित = भलाई । तप आराधि = तपस्या कर ।
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यहाँ जो दिखाई देता है वह स्थिर न रहेगा। यह जो अथाह जलसे भरा हुआ समन्दर दिखाई देता है, किसी दिन मरुस्थल में परिणत हो जायगा; पानीकी एक बूँद भी नहीं मिलेगी। यह बागीचा, जो आज इन्द्रके बगीचेकी बराबरी कर रहा है, जिसमें हजारों तरहके फूलोंके वृक्ष लग रहे हैं, होज बने हुए हैं, छोटी-छोटी नहरें कटी हुई हैं, संगमरमर और संगमूसाके चबूतरें बने हुए हैं, बीचमें इन्द्र-भवनके जैसा महल खड़ा है, किसी दिन उजाड़ हो जायगा; इसमें स्यार, लोमड़ी और ज़रख प्रभृति पशु बसेरा लेंगे। यह जो सामने महलोंकी नगरी (City of Palaces) दीखती है, जिसमें हजारों दुर्मज्जिले, तिमज्जिले, चौमज्जिले और सतमज्जिले आलीशान मकान खड़े हुए आकाश को चूम रहे हैं, जहाँ लाखों मनुष्योंके आने-जाने और काम-धन्या करनेके कारण पीठ-से-पीठ छिलती है, किसी दिन यहाँ घोर भयानक वन हो जायगा। मनुष्योंके स्थानमें सिंह, बाघ, हाथी, गेंडे, हिरन और स्यार प्रभृति पशु आ बसेंगे। और तो क्या—यह सूर्य, जो अपने तेजसे तीनों लोकमें प्रकाश फैलाता है, अन्धकार-रूप हो जायगा। यह अमृतसे पूर्ण सुधाकर—चन्द्रमा भी शून्य हो जायगा। इसकी शीतल चाँदनी न जान कहीं विलीन हो जायगी? हिमालय और सुमेरु जैसे पर्वत एक दिन मिट्टीमें मिल जायेंगे। यह ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी शून्य हो जायेंगे। सारा जगत् नाश हो जायगा। ये स्त्री पुत्र और नाते-रिश्तेदार न जाने कहीं छिप जायेंगे? युगोंको
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सहस्र चौकड़ियोंका ब्रह्माका एक दिन होता है। उस दिन के पूरे होते ही प्रलय होती है। तब इस जगत्की रचना करने वाला ब्रह्मा भी नाश हो जाता है। आज तक अनगिन्ती ब्रह्मा हुए। उन्होंने जगत्की रचना की और अन्तमें स्वयं नष्ट हो गये। जब हमारे पैदा करनेवालेका यह हाल है, तब हमारी क्या गिन्ती ?
यह काया,—जिसे मनुष्य अपना सर्वस्व समझता है, जिसे मल-मल कर धोता, इत्र-फुलेलोंसे सुवासित करता, नाना प्रकारके रत्नजटित मनोहर गहने पहनता, कष्टसे बचने और सुखो होनेके लिये नरम-नरम मलमली गहनोंपर सोता, पैरों को तुकलीफसे बचानेके लिये जोड़ी-गाड़ी या मोटरमें चढ़ता है,—एक दिन नाश हो जायगी ; पाँच तत्वोंसे बनी हुई काया पाँच तत्वोंमें ही लीन हो जायगी। जिस तरह पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद क्षणस्थायी होती है ; उसी तरह यह काया क्षणभंगुर है। दीपक और बिजलीका प्रकाश आता-जाता दीखता है, पर इस कायाका आदि-अन्त नहीं दीखता। यह काया कहाँसे आता है और कहाँ जाता है ? जिस तरह समुद्र में बुदबुदे उठते और मिट जाते हैं, उसी तरह शरीर बनते और क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। सच तो यह है कि, यह शरीर बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह चंचल और अस्थिर है। जिस दिन जन्म लिया, उसी दिन मौत पीछे पड़ गई ; अब वह अपना समय देखती है और समय पूर्ण होते ही प्राणीको नष्ट कर देती है।
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जिस तरह जलकी तरंगें उठ-उठकर नष्ट हो जाती हैं ; उसी तरह लक्ष्मी आकर क्षणमें विलीन हो जाती है। जिस तरह विजली चमककर गायब हो जाती है ; उसी तरह लक्ष्मी दशन देकर गायब हो जाती है। हवा और चपलाको रोकना अत्यन्त कठिन है, पर शायद कोई उन्हें रोक सके ; आकाशका चूर्ण करना अतीव कठिन है, पर शायद कोई आकाशको भी चूर्ण करनेमें समर्थ हो जाय ; समुद्रको भुजाओंसे तैरना बहुत कठिन है, पर शायद कोई तैरकर उसे भी पार कर सके ; इतने असम्भव काम शायद कोई सामर्थ्यवान् करले, पर चंचला लक्ष्मी को कोई भी स्थिर नहीं कर सकता। जिस तरह अंजलि में जल नहीं ठहरता ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसीके पास नहीं ठहरती। जिस तरह वेश्या एक पुरुषसे राजी नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको चाहती है ; उसी तरह लक्ष्मी भी किसी एकके पास नहीं रहती, नित-नये पुरुषोंको भजती है। इसीसे लक्ष्मी और वेश्या दोनोंको ही चपला कहते हैं।
जिस तरह सार्वसारिक पदार्थ लक्ष्मी और विषय-भोग तथा आयु चञ्चल और क्षणस्थायी हैं, उसी तरह यौवन या जवानों भी क्षणस्थायी हैं। जवानों आते दीखती है, पर जाते मालूम नहीं होती। हवाकी अपेक्षा भी तेज चालसे दिन-रात होते हैं और उसी तेजीसे जवानी भ्रष्ट क्षतम हो जाती और बुढ़ापा आ जाता है। उस समय विस्मय सा होने लगता है। यह
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शरीर तभी तक सुन्दर और मनोहर लगता है, जब तक बुढ़ापा नहीं आता। बुढ़ापा आते ही वह उछल-कूद, वह अकड़-तकड़, वह चमक-दमक, वह सुखों, वह छातियोंका उभार, वह नयनोंका रसीलापन न जाने कहाँ गायब हो जाता है। असलमें यौवनके लिये बुढ़ापा राहु है। जिस तरह चन्द्रमाको जब तक राहु नहीं ग्रसता, तभीतक प्रकाश रहता है; उसी तरह जब तक बुढ़ापा नहीं आता, तभी तक शरीरका सोन्दर्य और रूप-लावण्य बना रहता है। प्राणियोंको बाल्यावस्थाके बाद युवावस्था और युवावस्थाके बाद वृद्धावस्था अवश्य आती है। युवावस्था सदा नहीं रहती; अच्छी तरह गहरा विचार करने से जवानी क्षण-भरकी मालूम होती है।
संसारमें जो नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे मनभावन पदार्थ दिखाई देते हैं, ये सभी नाशमान् हैं। ये सब वास्तवमें कुछ भी नहीं; केवल मनकी कल्पनासे इनकी सृष्टि की गई है। मूर्ख ही इनमें आस्था रखते हैं, ज्ञानी नहीं।
इस जगत्में ज्ञानीका जीवन सार्थक और अज्ञानीका निरर्थक है। अज्ञानीके जीनेसे कोई लाभ नहीं। उसके जीनेसे अर्थ-सिद्धि नहीं होती। वह वृथा सुअवसर गँवाता है। मूर्ख मोहके मारे नहीं समझता, कि ऐसा मौका बड़ी मुश्किलसे मिला है। इस बार चूके तो ख़ैर नहीं। अज्ञानी अपनी अज्ञानता या मोहके कारण ही नाशमान् और दुःखके मूल विषयोंकी ओर दौड़ता है; पर आयु, यौवन और विषयों-
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की क्षणभंगुरता पर ध्यान नहीं देता । यह मायामोह नहीं तो क्या है ? “सुभाषितावलि”में लिखा है :—
चला विभूतिः क्षणभंगी यौवनं
कृतान्तदन्तान्तवर्त्ति जीवितम् ।
तथाप्यवज्ञा परलोकसाधने
गुणाम्हेा विस्मयकारि चैष्टितम् ।
विभूति चञ्चल है, यौवन क्षणभंगुर है, जीवन कालके दांतोंमें है ; तोभी लोग परलोक-साधनको परवा नहीं करते । मनुष्योंको यह चेष्टा विस्मयकारक है !
फिरदौसोने “शाहनामे”में कहा है :—“मनुष्य इस नापायेदार दुनियाँसे क्यों दिल लगाते हैं ; जबकि मौतका नक्शा दूरवाजे पर बज रहा है ?”
मनुष्यो ! होश करो, गफ़लतकी नींद छोड़ो । वह देखो ! मौत आपका द्वार खट-खटा रही है । अब तो मिथ्या संसारका मोह त्यागो । ये जो स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, माता-पिता आदिक प्यारे और सम्बन्धी दिखाई देते हैं, ये उसी वक्त तक हैं, जब तक कि शरीर नाश नहीं हुआ है । शरीरके नाश होते ही ये नज़र भी न आयेंगे । यह भी समझमें न आवेगा कि, कहाँ गये और कहाँसे आये थे । यह बन्धु-बान्धवोंका मिलना, उन बातियों या मुसाफ़िरोंकी त्मह है, जो भिन्न-भिन्न स्थानों से सफ़र करते हुए एक वृक्षके नीचे आकर ठहर जाते हैं और
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क्षण-भर विध्राम लेकर फिर अपनी-अपनी राहपर चल देते हैं या उन मुसाफिरोंकी तरह है, जो अनेक स्थानोंसे आकर एक सराय या धर्मशालामें ठहरते हैं ; और फिर कोई दो दिन और कोई चार दिन रहकर, अपनी-अपनी जगहको चल देते हैं। वृक्षोंके नीचे चन्द्र मिनट ठहरने वालों अथवा सरायके मुसाफिरोंका आपसमें प्रीति करना क्या अकृमन्दी है ? जिनका क्षण-भरका साथ है, उनमें दिल फँसाना दुःख मोल लेना है। उनके अलग होते ही मनमें भयानक वेदना होगी, अतः उनके साथ कोई सरोकार न रखना चाहिये। यह संसार दो स्थानोंके बीचका स्थान है। यात्री यहाँ आकर क्षण-भर के लिए आराम करते और फिर आगे चले जाते हैं। ऐसे यात्रियोंका आपसमें मेल बढ़ाना, एक दूसरे की मुहब्बतके फन्देमें फँसना, सचमुच ही दुःखोत्पादक है। समझदार लोग मुसाफिरोंसे दिल नहीं लगाते—उनसे प्रेम नहीं करते—उन्हें अपना-पराया नहीं समझते। न उन्हें किसीसे राग है न द्वेष। वे सबको समदृष्टि या एक नज़रसे देखते हुए साहाय्य करते और उनका कष्ट निवारण करते हैं, पर उनसे प्रीति नहीं करते ; लेकिन मूर्ख लोग खी-पुत्र, और माता-पिता प्रभुत्विकों अपना प्यारा समझते और दूसरोंकी पराया समझते हैं। इस जगतमें न कोई अपना है न पराया। यह जगत् एक वृक्ष है। इस पर हज़ारों-लाखों पक्षी भिन्न-भिन्न स्थानोंसे आकर रातको बसेरा लेते और सवेरे ही अपने-अपने स्थानोंको उड़
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जाते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानोंसे आये हुए पक्षियोंको, क्या रात भर के साथके लिये, आपसमें नाता जोड़ना चाहिये ? हरगिज़ नहीं, दूसरोंसे सम्बन्ध जोड़ना, किसीको अपना पुत्र और किसीको अपनी स्त्री एवं किसीको माँ या बहन समझ कर स्नेह करना तो मुर्खाता है ही। स्नेह तो अपनी कायासे भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह भी क्षणभंगुर है,—सदा साथ न रहेगी।
महात्मा सुन्दर दासजी कहते हैं :—
बालूके मन्दिर पाँहि, बैठि रहौ स्थिर होइ ।
राखत है जीवनकी आश, केज दिन की ॥
पल-पल जीजत, घटत जात घरी-घरी ।
चिनशत बेर कहा ? खबर न छिन की ॥
करत उपाय, भूटे लेनदेन खान-पान ।
मूसा इत-उत फिरे, ताकि रही मिनकी ॥१॥
देह-सनेह न छाँड़त है नर ।
जानत है थिर है यह देहा ॥
जीजत जात घटै दिन-ही-दिन ।
दीसत है घटको नित खेहा ॥
काल अचानक आय गहे कर ।
ठाँह गिराइ करे तन खेहा ॥
“सुन्दर” जानि यहू निहचै घर ।
एक निरंजनसँ कर नेहा ॥२॥
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अरे मूर्ख ! तू इस शरीरकी मुहब्बत नहीं छोड़ता, यह तेरी बड़ी भूल है। तू इस बालूके घरको स्थिर या चिरस्थायी समझता है, पर यह दिन-पर-दिन छीजता और घटता जाता है। हमें तो इस घटका नित्य क्षय ही दीखता है। देख, किता दिन काल अचानक आकर तेरे हाथ पकड़ लेगा और तुम्हें गिरा कर तेरे शरीरको खाक कर देगा। सुन्दरदासजी कहते हैं,—अरे मूर्ख ! तू मेरी बातको—मेरी सलाहको ठीक समझ, इसमें मीन-भेख न लगा। यह अटल बात है। और बातोंमें चाहे फर्क पड़ जाय, पर इसमें फर्क नहीं पड़ने का। इसलिये तू अपने इस शरीरसे, अपने खी-पुत्रोंसे और अपनी दौलतसे मुहब्बत छोड़कर, एक मात्र जगदीशसे प्रेम कर। उनसे स्नेह करेगा, तो सदा सुख पायेगा और इनसे मुहब्बत रखेगा, तो घोरतिघोर दुःख भोगेगा।
महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—अरे अज्ञानी मनुष्य ! मुझे तेरी इस बातपर बड़ा ही अवमना आता है कि, तू इस बालूके मकानमें निःशङ्क और मस्त होकर बैठ डूबा है और कितने ही दिनोंतक जीनेकी उम्मीद रखता है। यह तेरा बाल का घर हर क्षण छीजता और हर मिनट घटता जाता है। इसको नाश होते कितनी देर लगेगी ? तुम्हें तो एक सेकण्डका भी भरोसा नहीं। तू इस बालूके क्षणभङ्गुर घरमें बेशरके बैठ डूबा अनेक तरहके झूठे उपाय-उद्योग, दिन और खान-पान करता है ! तू सूँहकी तरह इधर-उधर उल्लतता-कूदता
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फिरता है ! क्या तुम्हें खबर नहीं कि, जिस तरह बिल्ली चूहेकी ताकमें बैठी रहती है ; उसी तरह तेरी धातमें मौत बैठी है ?
खुलासा—जरा भी समझ रखने वाले समझ सकते हैं, कि प्राणियोंके शरीरोंके भीतर कोई ऐसी चीज़ है, जिसके रहने से प्राणी चलते-फिरते, काम-धन्या करते और ज़िन्दा समझ जाते हैं। जिस वक्त वह चीज़ शरीरसे निकल जाती है, उस वक्त मनुष्य मुर्दा हो जाता है, उस समय वह न तो चल फिर सकता है, न देख-सुन या और कोई काम कर सकता है। जिस चीज़के प्रकाशसे इस शरीरमें प्रकाश रहता है, जिसके बलसे यह काम-धन्ये करता और बोलता-चालता है, उसे जीव या आत्मा कहते हैं। हमारा शरीर हमारे आत्माके रहनेका घर है। जिस तरह मकानमें मोरी, परनाले, खिड़की और जंगले होते हैं, उसी तरह आत्माके रहनेके इस शरीर रूपी घरमें भी मोरी और परनाले बगैर हैं। आँख, कान, नाक और मुँह प्रभृति इस शरीर रूपी घरके द्वार और गुदा-लिङ्ग या योनि बगैर मोरी-परनाले हैं। शरीरके करोड़ों छेद इस मकानके जड़ले और खिड़कियाँ हैं। मतलब यह कि, यह शरीर आत्मा या जीवके बसनेका घर है। यह घर मिट्टी और जल प्रभृति पंच तत्वोंसे बना हुआ है। इस घरके बनाने वाला कारीगर परमात्मा है।
जिस तरह परमात्माने आत्माके रहनेके लिए पाँच तत्वोंसे यह शरीर रूपी घर बना दिया है ; उसी तरह हमने भी इस अपने आत्माके शरीरकी रक्षाके लिये—मेह पानो और धूप आदिके
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बचनेके लिए—मिट्टी या ईंट पत्थर प्रभृतिके मकान बना लिये हैं। हमारे बनाये हुए ईंट पत्थरोंके मकान सौ-सौ दो-दो सौ और पाँच-पाँच सौ बरसों तक रह सकते हैं। हजार-हजार बरससे ज़ियादा मुद्दतके बने हुए मकान आज तक खड़े हुए हैं। पर हमारे आत्माके रहनेका एवं तत्वाँसे बना हुआ मकान इतना मज़बूत नहीं—वह क्षणभरमें ढह जाता है। इस लिये इस आत्माके मकान—शरीर—को महात्मा सुन्दरदासजी बालूका मकान कहते हैं। क्योंकि बालूका मकान इधर बनता और उधर गिर पड़ता है। उसकी उम्र पलभर की भी नहीं।
मनुष्य अज्ञान और मोहसे अन्धा रहनेके कारण, इस बालूके मकानकी क्षणभंगुरताका कभी ख्याल भी नहीं करता। वह इस बालूके मकानमें ही सैकड़ों बरसों तक रहनेकी आशा करता है ! मनुष्यकी इस ग़फ़लत और बेहोशीपर पूर्णब्रानी महात्मा सुन्दरदासजीको दुःख और आश्चर्य होता है। महा-पुरुष सदा पराया भला बाहा करते हैं, वे दूसरोंको दुःख और क्लेशों से बचाना अपना कर्तव्य और फ़र्ज़ समझते हैं, इसलिये वे अज्ञानान्धकारमें डूबे हुए मनुष्योंको सावधान करनेके लिए कहते हैं—अरे मूर्ख ! तू इस बालूके घरमें रहकर भी बरसों जीनेकी—इस घरमें रहनेकी—आशा करता है ? अरे नादान ! होश कर ! जाग ! तेरा यह बालूका घर पलक मारते गिर जायगा ! जबसे तू इस बालूके घरमें आया है, तभीसे इसकी नींव हिलने लग गई है। एक मिनट या एक सेकण्डमें
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गंगा ही चाहता है ! ऐसे क्षणभंगुर घरमें रहकर तू मकान बनवाता है ; बाग-बगीचे लगवाता है ; किसी को अपनी स्त्री, किसीको अपना पुत्र और किसीको अपना बाप, भाई या मित्र समझता है ; इनके मोह-जालमें फंसता है ; बेहोशीमें, लोगों पर अत्याचार और जुल्म करता एवं पराया धन हड़पता है ! मुझे तेरी इन करतूतोंको देखकर निहायत आश्चर्य भी होता और दुःख भी होता है ! सच तो यह है कि मुझे तेरी नादानी पर तरस आता है । खेर, जो हुआ सो हुआ, अब भी चेत जा !! धन-दौलत, स्त्री-पुत्र, राज-पाट और ज़मीन्दारीका मोह त्यागकर अपने बनानेवालेकी शरणमें जा । वही तेरे इस बालूके घरमें बारम्बार आने और फिर क्षणभरमें इसे छोड़ भागनेके घोर कष्ट को दूर कर सकता है । अगर तू इस जगज्जालमें फँसा रहेगा, मेरी बातपर ध्यान न देगा, तो पीछे बहुत पछतावेगा । जिस समय तेरा यह घर गिरनेपर आवेगा, तू इसे छोड़नेके लिए मजबूर होगा ; उस समय तू हजार चाहने और हजार रोने-कल्प-नेपर भी इसमें क्षणभर भी न रह सकेगा । जब तक तू इस बालूके घरमें है, तभीतक तेरी स्त्री और तभी तक तेरा पुत्र और धन-दौलत आदि हैं । जहाँ तैने यह घर छोड़ा या तेरा यह घर गिरा ; फिर न तुझे स्त्री दीखेगी, न पुत्र दीखेगा और न धन-दौलत ही । यह बालूका घर तुझे, एक क्षणभरके लिये, इस गुरुजसे मिला है कि, तू इसमें जितनी देर रहे उतनी देर जगदीशकी भक्ति करके, अपने कर्मबन्धन काटले और जन्म-मरण
१३
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के भंभटोंसे बचकर, अपने मालिकमें मिल जावे ; ताकि फिर तुझे कभी दुःख न भोगने पड़ें—तू सदा-सवदा—अनन्त काल तक नित्य और अविनाशी सुख भोगता रहे ।
लक्ष्मी क्षणभंगुर है । समुद्रमें जिस तरह तरंगें उठतीं और बिलीन हो जाती हैं ; उसी तरह लक्ष्मी से विषय-भोग उपजते और नष्ट हो जाते हैं । जिस तरह चपला की चमक स्थिर नहीं रहती ; उसी तरह भोग भी स्थिर नहीं रहते । विषयोंके भोगनेसे तृष्णा घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है । तृष्णा के उदय होनेसे पुरुषके सब गुण नष्ट हो जाते हैं । दूधमें मधुरता उसी समय तक रहती है, जब तक कि उसे सर्प नहीं छूता ; पुरुषमें गुण भी उसी समय तक रहते हैं, जब तक कि तृष्णाका स्पर्श नहीं होता । अतः बुद्धिमानो ! अनित्य, नाशमान् एवं दुःखों की खान विष-समान विषयों से दूर रहो ; क्योंकि इनमें जरा भी सुख नहीं । जब तक विषय-भोग रहेंगे तभी तक आप सुखी रहेंगे ; पर एक-न-एक दिन उनसे आप का वियोग अवश्य होगा । उस समय आप तृष्णाकी आगमें जलांगे, बारम्बार जन्म लोगे और मरोगे ; अतः इन्द्रियोंको वश में करो और एकाग्र चित्तसे परमात्मा का भजन करो ; क्योंकि विषयोंके भोगनेसे नरकाश्रममें जलांगे और जन्म-मरण के घोर संकट सहोगे ; पर परमात्मा के भजन या योगसाधन से नित्य सुख भोगते हुए परमानन्दमें लीन हो जाओगे ।
बहुत से मनुष्य मनको तो एकाग्र नहीं करते, पर दिखीवा
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माला जपते हैं, गोमुखीमें सड़ा-सड़ हाथ चलाते हैं, “गीता” और “विष्णु सहस्रनाम” प्रभृतिका पाठ करते हैं और बीच-बीचमें कारोबारकी बातें भी करते रहते हैं अथवा स्त्री-बच्चोंके भगड़े निपटाया करते हैं। ऐसे भजन करने और माला फेरने से कोई लाभ नहीं। इस तरह सग्य बुथा नष्ट होता है। मन के एक ठौर हुए विना, शान्त और स्थिर हुए विना सब बुथा है। महात्मा कबीर ने ठाक ही कहा है :—
जेती लहर समुद्रकी, तेती मनकी दौरि । सहजै हीरा ऊपजे, जो मन आवै दौरि ॥ माला फेरत युग गया, पाया न मनका फेर । करका मनका छौड़िके, मन का मनका फेर ॥ भूँड सुड़ावत दिन गये, अजहूँ न मिलिया राम । राम नाम कहो क्या करै, मनके औरै काम ॥ तनको योगी सब करें, मनको चिरला कोय । सहजै सब विधि पाइये, जो मन योगी होय ॥
जितनी समुद्रकी लहरें हैं; उतनी ही मन की दौड़ है। अगर मन ठिकाने आजाय, उसमें समुद्र की सौ तरंगें न उठ, तो सहजमें हीरा पैदा हो जाय; यानी परमात्मा मिल जाय।
माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मनका फेर न मिला; अतः हाथ का मनिया छोड़कर, मनका मनिया फेर। हाथ
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की माला फेरनेसे कोई लाभ नहीं ; लाभ है मन की माला फेरने में । मन लगाकर एक बार भी ईश्वरको याद करनेसे बड़ा फल मिलता है ; पर ऋद्धवल चित्त से दिन-रात माला फेरने से भी कुछ नहीं मिलता ।
मूँड-मुँडाते अनेक दिन हो गये, पर आज तक भगवान् न मिले । मिले कैसे ? मन राममें लगे, तब तो राम मिले । मन तो विषय-भोगोंमें लगा रहता है, फिर राम कैसे मिले ? जिस तरह रवि और रजनी—दिन और रात—एकत्र नहीं होते, उसी तरह राम और काम एकत्र नहीं मिलते। जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है, वहाँ काम नहीं ।
तन को सब योगी करते हैं, पर मन को कोई ही योगी करता है । अगर मन योगी हो जाय, तो सहजमें सिद्धि मिल जाय । लोग गेरुवे कपड़े पहन लेते हैं, जटा रखा लेते हैं, हाथमें कमण्डल और बगल में भृगछाला ले लेते हैं—इस तरह योगी बन जाते हैं, पर मन उनका संसारी भोगोंमें ही लगा रहता है ; इसलिये उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—ईश्वर-दर्शन नहीं होता । अगर वे लोग कपड़े चाहेँ गृहस्थों के से ही पहनेँ, गृहस्थोंकी तरह ही खायें-पीवें ; पर मन को एक परमात्मामें रक्खें, तो निश्चय ही उन्हें भगवान् मिल जाय । जो मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता है, पर उसमें आसक्ति नहीं रखता, यानी जलमें कमलकी तरह रहता है, उसकी मुक्ति निश्चय ही हो जाती है ; पर जो संन्यासी होकर विषयोंमें आसक्ति रखता है, उसकी
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मोक्ष नहीं होती। राजा जनक गृहस्थीमें रहते थे; सब तरह के राजभोग भोगते थे; पर भोगोंमें उनकी आसक्ति नहीं थी, इसी से उनकी मुक्ति हो गई।
सारान्श—विषय-भोग, आयु और यौवनको अनित्य और क्षणभंगुर समझकर इनमें आसक्ति न रखो और मनको एकाग्र करके हरक्षण परमात्माका भजन करो—तो जन्म-मरणसे छुटकारा मिल जाय और परमानन्दकी प्राप्ति हो जाय। कबीरदासजी कहते हैं:—
कहा भरोसो देहको, विनति जाय छिन मैंहि ।
श्याम श्याम सुमिरन करो, और जतन कबु नाहि ॥
इस शरीरका क्या भरोसा? यह क्षण-भरमें नष्ट हो जाय। इस दशामें, सर्वात्तम उपाय यही है कि, हर साँस पर परमात्माका नाम लो। बिना उसके नामके कोई साँस न जाने पावे। बस, इससे बढ़कर उद्धारका और उपाय नहीं है।
कुण्डलिया ।
जेसे चंचल चंचला, लोहीं चंचल भोग ।
तैसेही यह आयु है, ज्यों घट पवन प्रयोग ।
चंचल = स्थिर, तरल, चपल। चञ्चला = बिजली, चपला। लोहीं = उसी तरह। भोग = स्त्री आदिका उपभोग। आयु = उम्र। घट =
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ज्यों घट पवन प्रयोग, तरल ल्यौही यौवन तन ।
विनसत लगत न वार, गहत हवै जात श्रोसकन ।
देख्यौ दुःसह दुःख, देहधारिनको ऐसे ।
साधत सन्त समाधि, व्याधि सों छूटत जैसे ॥५४॥
54. Enjoyments are short-lived like the flash of lightning in the midst of thick clouds. Life is transitory like the water vapors present in the clouds which are scattered away by the blowing of a heavy gale. Men's attempts to preserve their youth for a long time are also futile. Considering all these things, O wise men! It is only proper that you direct your attention at once to Yoga which is easy to practise provided you are possessed of the virtues of perseverance and meditation.
पुरये ग्रामे वने वा महति क्षितपटच्छत्तपालीं कपाली-
मादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतधुग्धुग्धुशोपकगटम् ॥
द्वारद्वारं पश्चतो वरमुदरदरीपूरणाय चूधातौ
मानी प्राणी स धन्यो न पुनरुद्वदिनं तुल्यकुल्येषुदीनः ॥५४॥
वह चूधातौ किन्तु मानी पुरुष, जो अपने पेटरूपी खंडुके भरने
घड़ा, कलशो, गगरो। पवन = हवा। तरल = अस्थिर, चल्चल। यौवन = जवानो। तन = शरीर। विनसत = नाश होते। वार = ढेर। गहत = पकड़ते हो। श्रोसकन = श्रोसके कथा, शबनसके कूतरे। दुःसह = जो सहा न जाने, असह। देहधारी = शरीरधारी, मनुष्य और पशुपक्षी आदि। सन्त = साधु, उत्तम मनुष्य। समाधि = ध्यान, योगकी क्रिया विशेष। व्याधि = रोग, दुःख, क्लेश।
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के लिए हाथमें पवित्र साफ़ कपड़े से ढका हुआ ठिकरा लेकर वन वन और गैव-गैव घूमता है और उनके दरवाजे पर जाता है, जिनकी चौखट न्यायतः विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराये हुए हवन के धूपसे मलिन हो रही है, अच्छा है; किन्तु वह अच्छा नहीं, जो समान कुलवालों के यहाँ जाकर मँगता है ॥५॥
तुलसीदासजीने भी कहा है—
घरमें भूखा पड़ रहे, दस फ़ाके हो जायँ ।
तुलसी मैया-बन्धुके, कबहुँ न मँगान जाय ॥
तुलसीदासजी कहते हैं, अगर मनुष्यके पास खानेको न हो, उसे उपवास करते-करते दस दिन बीत जायँ, अन्न बिना प्राण नाश होनेकी भी संभावना हो; तोभी उसे अपनी या अपने परिवारकी जीवन-रक्षाके लिए, कुछ मिलनेकी आशासे, भाई-बन्धुओंके पास हरगिज़ न जाना चाहिये। क्योंकि ऐसे मौके पर वे लोग उसका अपमान करते हैं। उस अपमानका दुःख भोजन बिना प्राण नाश होनेके दुःखसे अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युकी यंत्रणाओंका सहना आसान है, पर उस अपमानको सहना कठिन है। और भी किसीने कहा है—
वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्र सेवितम् ।
द्रमालयः पक्षलाम्बु भोजनम् ॥
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तृणानि शय्या परिधान बल्कलम् ।
न बन्धुमध्ये धनहीन जीवनम् ॥
व्याघ्र और हाथियोंसे भरे हुए जड़लमें रहना भला, वक्षोंके नीचे बसना भला, पके-पके फल खाना और जल पीना भला, वास पर सो रहना और डालोंके कपड़े पहन लेना भला ; पर साह्योंके बीचमें धनहीन होकर रहना भला नहीं ।
सोरठा ।
विप्रनेक घर जाय, भीख माँगिबौ है भलो ।
बन्धुन कौ सिरनाय, भोजनहु करिबौ बुरो ॥५५॥
55. Worthy of all praise is the hungry but proud man who for the sake of filling the empty pit of his stomach wanders from village to village or from forest to forest holding in his hand a broken earthen vessel covered with a clean piece of cloth, begging at doors the frames of which have been blackened by the smoke rising from the oblation-fires of learned Brahmins, but it is not proper to demean himself by asking people of equal birth for charity.
चाण्डालः क्रियं द्विजातिरथवा शत्रोऽथ किं तापसः
किं वा तत्त्वविवेकपेशलमतिर्योगीश्वरः कोऽपि किम् ॥
विप्रन = ब्राह्मणों । बन्धुन = साह्यों । सिर नाय = सिर नवाकर माँगिबौ = माँगला । करिबौ = करना ।