भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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के लिए हाथमें पवित्र साफ़ कपड़े से ढका हुआ ठिकरा लेकर वन वन और गैव-गैव घूमता है और उनके दरवाजे पर जाता है, जिनकी चौखट न्यायतः विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराये हुए हवन के धूपसे मलिन हो रही है, अच्छा है; किन्तु वह अच्छा नहीं, जो समान कुलवालों के यहाँ जाकर मँगता है ॥५॥

तुलसीदासजीने भी कहा है—

घरमें भूखा पड़ रहे, दस फ़ाके हो जायँ ।

तुलसी मैया-बन्धुके, कबहुँ न मँगान जाय ॥

तुलसीदासजी कहते हैं, अगर मनुष्यके पास खानेको न हो, उसे उपवास करते-करते दस दिन बीत जायँ, अन्न बिना प्राण नाश होनेकी भी संभावना हो; तोभी उसे अपनी या अपने परिवारकी जीवन-रक्षाके लिए, कुछ मिलनेकी आशासे, भाई-बन्धुओंके पास हरगिज़ न जाना चाहिये। क्योंकि ऐसे मौके पर वे लोग उसका अपमान करते हैं। उस अपमानका दुःख भोजन बिना प्राण नाश होनेके दुःखसे अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युकी यंत्रणाओंका सहना आसान है, पर उस अपमानको सहना कठिन है। और भी किसीने कहा है—

वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्र सेवितम् ।

द्रमालयः पक्षलाम्बु भोजनम् ॥