वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षण-भर विध्राम लेकर फिर अपनी-अपनी राहपर चल देते हैं या उन मुसाफिरोंकी तरह है, जो अनेक स्थानोंसे आकर एक सराय या धर्मशालामें ठहरते हैं ; और फिर कोई दो दिन और कोई चार दिन रहकर, अपनी-अपनी जगहको चल देते हैं। वृक्षोंके नीचे चन्द्र मिनट ठहरने वालों अथवा सरायके मुसाफिरोंका आपसमें प्रीति करना क्या अकृमन्दी है ? जिनका क्षण-भरका साथ है, उनमें दिल फँसाना दुःख मोल लेना है। उनके अलग होते ही मनमें भयानक वेदना होगी, अतः उनके साथ कोई सरोकार न रखना चाहिये। यह संसार दो स्थानोंके बीचका स्थान है। यात्री यहाँ आकर क्षण-भर के लिए आराम करते और फिर आगे चले जाते हैं। ऐसे यात्रियोंका आपसमें मेल बढ़ाना, एक दूसरे की मुहब्बतके फन्देमें फँसना, सचमुच ही दुःखोत्पादक है। समझदार लोग मुसाफिरोंसे दिल नहीं लगाते—उनसे प्रेम नहीं करते—उन्हें अपना-पराया नहीं समझते। न उन्हें किसीसे राग है न द्वेष। वे सबको समदृष्टि या एक नज़रसे देखते हुए साहाय्य करते और उनका कष्ट निवारण करते हैं, पर उनसे प्रीति नहीं करते ; लेकिन मूर्ख लोग खी-पुत्र, और माता-पिता प्रभुत्विकों अपना प्यारा समझते और दूसरोंकी पराया समझते हैं। इस जगतमें न कोई अपना है न पराया। यह जगत् एक वृक्ष है। इस पर हज़ारों-लाखों पक्षी भिन्न-भिन्न स्थानोंसे आकर रातको बसेरा लेते और सवेरे ही अपने-अपने स्थानोंको उड़