भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जाते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानोंसे आये हुए पक्षियोंको, क्या रात भर के साथके लिये, आपसमें नाता जोड़ना चाहिये ? हरगिज़ नहीं, दूसरोंसे सम्बन्ध जोड़ना, किसीको अपना पुत्र और किसीको अपनी स्त्री एवं किसीको माँ या बहन समझ कर स्नेह करना तो मुर्खाता है ही। स्नेह तो अपनी कायासे भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह भी क्षणभंगुर है,—सदा साथ न रहेगी।

महात्मा सुन्दर दासजी कहते हैं :—

बालूके मन्दिर पाँहि, बैठि रहौ स्थिर होइ ।

राखत है जीवनकी आश, केज दिन की ॥

पल-पल जीजत, घटत जात घरी-घरी ।

चिनशत बेर कहा ? खबर न छिन की ॥

करत उपाय, भूटे लेनदेन खान-पान ।

मूसा इत-उत फिरे, ताकि रही मिनकी ॥१॥

देह-सनेह न छाँड़त है नर ।

जानत है थिर है यह देहा ॥

जीजत जात घटै दिन-ही-दिन ।

दीसत है घटको नित खेहा ॥

काल अचानक आय गहे कर ।

ठाँह गिराइ करे तन खेहा ॥

“सुन्दर” जानि यहू निहचै घर ।

एक निरंजनसँ कर नेहा ॥२॥