वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अरे मूर्ख ! तू इस शरीरकी मुहब्बत नहीं छोड़ता, यह तेरी बड़ी भूल है। तू इस बालूके घरको स्थिर या चिरस्थायी समझता है, पर यह दिन-पर-दिन छीजता और घटता जाता है। हमें तो इस घटका नित्य क्षय ही दीखता है। देख, किता दिन काल अचानक आकर तेरे हाथ पकड़ लेगा और तुम्हें गिरा कर तेरे शरीरको खाक कर देगा। सुन्दरदासजी कहते हैं,—अरे मूर्ख ! तू मेरी बातको—मेरी सलाहको ठीक समझ, इसमें मीन-भेख न लगा। यह अटल बात है। और बातोंमें चाहे फर्क पड़ जाय, पर इसमें फर्क नहीं पड़ने का। इसलिये तू अपने इस शरीरसे, अपने खी-पुत्रोंसे और अपनी दौलतसे मुहब्बत छोड़कर, एक मात्र जगदीशसे प्रेम कर। उनसे स्नेह करेगा, तो सदा सुख पायेगा और इनसे मुहब्बत रखेगा, तो घोरतिघोर दुःख भोगेगा।
महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—अरे अज्ञानी मनुष्य ! मुझे तेरी इस बातपर बड़ा ही अवमना आता है कि, तू इस बालूके मकानमें निःशङ्क और मस्त होकर बैठ डूबा है और कितने ही दिनोंतक जीनेकी उम्मीद रखता है। यह तेरा बाल का घर हर क्षण छीजता और हर मिनट घटता जाता है। इसको नाश होते कितनी देर लगेगी ? तुम्हें तो एक सेकण्डका भी भरोसा नहीं। तू इस बालूके क्षणभङ्गुर घरमें बेशरके बैठ डूबा अनेक तरहके झूठे उपाय-उद्योग, दिन और खान-पान करता है ! तू सूँहकी तरह इधर-उधर उल्लतता-कूदता