वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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फिरता है ! क्या तुम्हें खबर नहीं कि, जिस तरह बिल्ली चूहेकी ताकमें बैठी रहती है ; उसी तरह तेरी धातमें मौत बैठी है ?
खुलासा—जरा भी समझ रखने वाले समझ सकते हैं, कि प्राणियोंके शरीरोंके भीतर कोई ऐसी चीज़ है, जिसके रहने से प्राणी चलते-फिरते, काम-धन्या करते और ज़िन्दा समझ जाते हैं। जिस वक्त वह चीज़ शरीरसे निकल जाती है, उस वक्त मनुष्य मुर्दा हो जाता है, उस समय वह न तो चल फिर सकता है, न देख-सुन या और कोई काम कर सकता है। जिस चीज़के प्रकाशसे इस शरीरमें प्रकाश रहता है, जिसके बलसे यह काम-धन्ये करता और बोलता-चालता है, उसे जीव या आत्मा कहते हैं। हमारा शरीर हमारे आत्माके रहनेका घर है। जिस तरह मकानमें मोरी, परनाले, खिड़की और जंगले होते हैं, उसी तरह आत्माके रहनेके इस शरीर रूपी घरमें भी मोरी और परनाले बगैर हैं। आँख, कान, नाक और मुँह प्रभृति इस शरीर रूपी घरके द्वार और गुदा-लिङ्ग या योनि बगैर मोरी-परनाले हैं। शरीरके करोड़ों छेद इस मकानके जड़ले और खिड़कियाँ हैं। मतलब यह कि, यह शरीर आत्मा या जीवके बसनेका घर है। यह घर मिट्टी और जल प्रभृति पंच तत्वोंसे बना हुआ है। इस घरके बनाने वाला कारीगर परमात्मा है।
जिस तरह परमात्माने आत्माके रहनेके लिए पाँच तत्वोंसे यह शरीर रूपी घर बना दिया है ; उसी तरह हमने भी इस अपने आत्माके शरीरकी रक्षाके लिये—मेह पानो और धूप आदिके