वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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बचनेके लिए—मिट्टी या ईंट पत्थर प्रभृतिके मकान बना लिये हैं। हमारे बनाये हुए ईंट पत्थरोंके मकान सौ-सौ दो-दो सौ और पाँच-पाँच सौ बरसों तक रह सकते हैं। हजार-हजार बरससे ज़ियादा मुद्दतके बने हुए मकान आज तक खड़े हुए हैं। पर हमारे आत्माके रहनेका एवं तत्वाँसे बना हुआ मकान इतना मज़बूत नहीं—वह क्षणभरमें ढह जाता है। इस लिये इस आत्माके मकान—शरीर—को महात्मा सुन्दरदासजी बालूका मकान कहते हैं। क्योंकि बालूका मकान इधर बनता और उधर गिर पड़ता है। उसकी उम्र पलभर की भी नहीं।
मनुष्य अज्ञान और मोहसे अन्धा रहनेके कारण, इस बालूके मकानकी क्षणभंगुरताका कभी ख्याल भी नहीं करता। वह इस बालूके मकानमें ही सैकड़ों बरसों तक रहनेकी आशा करता है ! मनुष्यकी इस ग़फ़लत और बेहोशीपर पूर्णब्रानी महात्मा सुन्दरदासजीको दुःख और आश्चर्य होता है। महा-पुरुष सदा पराया भला बाहा करते हैं, वे दूसरोंको दुःख और क्लेशों से बचाना अपना कर्तव्य और फ़र्ज़ समझते हैं, इसलिये वे अज्ञानान्धकारमें डूबे हुए मनुष्योंको सावधान करनेके लिए कहते हैं—अरे मूर्ख ! तू इस बालूके घरमें रहकर भी बरसों जीनेकी—इस घरमें रहनेकी—आशा करता है ? अरे नादान ! होश कर ! जाग ! तेरा यह बालूका घर पलक मारते गिर जायगा ! जबसे तू इस बालूके घरमें आया है, तभीसे इसकी नींव हिलने लग गई है। एक मिनट या एक सेकण्डमें