भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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गंगा ही चाहता है ! ऐसे क्षणभंगुर घरमें रहकर तू मकान बनवाता है ; बाग-बगीचे लगवाता है ; किसी को अपनी स्त्री, किसीको अपना पुत्र और किसीको अपना बाप, भाई या मित्र समझता है ; इनके मोह-जालमें फंसता है ; बेहोशीमें, लोगों पर अत्याचार और जुल्म करता एवं पराया धन हड़पता है ! मुझे तेरी इन करतूतोंको देखकर निहायत आश्चर्य भी होता और दुःख भी होता है ! सच तो यह है कि मुझे तेरी नादानी पर तरस आता है । खेर, जो हुआ सो हुआ, अब भी चेत जा !! धन-दौलत, स्त्री-पुत्र, राज-पाट और ज़मीन्दारीका मोह त्यागकर अपने बनानेवालेकी शरणमें जा । वही तेरे इस बालूके घरमें बारम्बार आने और फिर क्षणभरमें इसे छोड़ भागनेके घोर कष्ट को दूर कर सकता है । अगर तू इस जगज्जालमें फँसा रहेगा, मेरी बातपर ध्यान न देगा, तो पीछे बहुत पछतावेगा । जिस समय तेरा यह घर गिरनेपर आवेगा, तू इसे छोड़नेके लिए मजबूर होगा ; उस समय तू हजार चाहने और हजार रोने-कल्प-नेपर भी इसमें क्षणभर भी न रह सकेगा । जब तक तू इस बालूके घरमें है, तभीतक तेरी स्त्री और तभी तक तेरा पुत्र और धन-दौलत आदि हैं । जहाँ तैने यह घर छोड़ा या तेरा यह घर गिरा ; फिर न तुझे स्त्री दीखेगी, न पुत्र दीखेगा और न धन-दौलत ही । यह बालूका घर तुझे, एक क्षणभरके लिये, इस गुरुजसे मिला है कि, तू इसमें जितनी देर रहे उतनी देर जगदीशकी भक्ति करके, अपने कर्मबन्धन काटले और जन्म-मरण

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