भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

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गंगा ही चाहता है ! ऐसे क्षणभंगुर घरमें रहकर तू मकान बनवाता है ; बाग-बगीचे लगवाता है ; किसी को अपनी स्त्री, किसीको अपना पुत्र और किसीको अपना बाप, भाई या मित्र समझता है ; इनके मोह-जालमें फंसता है ; बेहोशीमें, लोगों पर अत्याचार और जुल्म करता एवं पराया धन हड़पता है ! मुझे तेरी इन करतूतोंको देखकर निहायत आश्चर्य भी होता और दुःख भी होता है ! सच तो यह है कि मुझे तेरी नादानी पर तरस आता है । खेर, जो हुआ सो हुआ, अब भी चेत जा !! धन-दौलत, स्त्री-पुत्र, राज-पाट और ज़मीन्दारीका मोह त्यागकर अपने बनानेवालेकी शरणमें जा । वही तेरे इस बालूके घरमें बारम्बार आने और फिर क्षणभरमें इसे छोड़ भागनेके घोर कष्ट को दूर कर सकता है । अगर तू इस जगज्जालमें फँसा रहेगा, मेरी बातपर ध्यान न देगा, तो पीछे बहुत पछतावेगा । जिस समय तेरा यह घर गिरनेपर आवेगा, तू इसे छोड़नेके लिए मजबूर होगा ; उस समय तू हजार चाहने और हजार रोने-कल्प-नेपर भी इसमें क्षणभर भी न रह सकेगा । जब तक तू इस बालूके घरमें है, तभीतक तेरी स्त्री और तभी तक तेरा पुत्र और धन-दौलत आदि हैं । जहाँ तैने यह घर छोड़ा या तेरा यह घर गिरा ; फिर न तुझे स्त्री दीखेगी, न पुत्र दीखेगा और न धन-दौलत ही । यह बालूका घर तुझे, एक क्षणभरके लिये, इस गुरुजसे मिला है कि, तू इसमें जितनी देर रहे उतनी देर जगदीशकी भक्ति करके, अपने कर्मबन्धन काटले और जन्म-मरण

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के भंभटोंसे बचकर, अपने मालिकमें मिल जावे ; ताकि फिर तुझे कभी दुःख न भोगने पड़ें—तू सदा-सवदा—अनन्त काल तक नित्य और अविनाशी सुख भोगता रहे ।

लक्ष्मी क्षणभंगुर है । समुद्रमें जिस तरह तरंगें उठतीं और बिलीन हो जाती हैं ; उसी तरह लक्ष्मी से विषय-भोग उपजते और नष्ट हो जाते हैं । जिस तरह चपला की चमक स्थिर नहीं रहती ; उसी तरह भोग भी स्थिर नहीं रहते । विषयोंके भोगनेसे तृष्णा घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है । तृष्णा के उदय होनेसे पुरुषके सब गुण नष्ट हो जाते हैं । दूधमें मधुरता उसी समय तक रहती है, जब तक कि उसे सर्प नहीं छूता ; पुरुषमें गुण भी उसी समय तक रहते हैं, जब तक कि तृष्णाका स्पर्श नहीं होता । अतः बुद्धिमानो ! अनित्य, नाशमान् एवं दुःखों की खान विष-समान विषयों से दूर रहो ; क्योंकि इनमें जरा भी सुख नहीं । जब तक विषय-भोग रहेंगे तभी तक आप सुखी रहेंगे ; पर एक-न-एक दिन उनसे आप का वियोग अवश्य होगा । उस समय आप तृष्णाकी आगमें जलांगे, बारम्बार जन्म लोगे और मरोगे ; अतः इन्द्रियोंको वश में करो और एकाग्र चित्तसे परमात्मा का भजन करो ; क्योंकि विषयोंके भोगनेसे नरकाश्रममें जलांगे और जन्म-मरण के घोर संकट सहोगे ; पर परमात्मा के भजन या योगसाधन से नित्य सुख भोगते हुए परमानन्दमें लीन हो जाओगे ।

बहुत से मनुष्य मनको तो एकाग्र नहीं करते, पर दिखीवा

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माला जपते हैं, गोमुखीमें सड़ा-सड़ हाथ चलाते हैं, “गीता” और “विष्णु सहस्रनाम” प्रभृतिका पाठ करते हैं और बीच-बीचमें कारोबारकी बातें भी करते रहते हैं अथवा स्त्री-बच्चोंके भगड़े निपटाया करते हैं। ऐसे भजन करने और माला फेरने से कोई लाभ नहीं। इस तरह सग्य बुथा नष्ट होता है। मन के एक ठौर हुए विना, शान्त और स्थिर हुए विना सब बुथा है। महात्मा कबीर ने ठाक ही कहा है :—

जेती लहर समुद्रकी, तेती मनकी दौरि । सहजै हीरा ऊपजे, जो मन आवै दौरि ॥ माला फेरत युग गया, पाया न मनका फेर । करका मनका छौड़िके, मन का मनका फेर ॥ भूँड सुड़ावत दिन गये, अजहूँ न मिलिया राम । राम नाम कहो क्या करै, मनके औरै काम ॥ तनको योगी सब करें, मनको चिरला कोय । सहजै सब विधि पाइये, जो मन योगी होय ॥

जितनी समुद्रकी लहरें हैं; उतनी ही मन की दौड़ है। अगर मन ठिकाने आजाय, उसमें समुद्र की सौ तरंगें न उठ, तो सहजमें हीरा पैदा हो जाय; यानी परमात्मा मिल जाय।

माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मनका फेर न मिला; अतः हाथ का मनिया छोड़कर, मनका मनिया फेर। हाथ

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की माला फेरनेसे कोई लाभ नहीं ; लाभ है मन की माला फेरने में । मन लगाकर एक बार भी ईश्वरको याद करनेसे बड़ा फल मिलता है ; पर ऋद्धवल चित्त से दिन-रात माला फेरने से भी कुछ नहीं मिलता ।

मूँड-मुँडाते अनेक दिन हो गये, पर आज तक भगवान् न मिले । मिले कैसे ? मन राममें लगे, तब तो राम मिले । मन तो विषय-भोगोंमें लगा रहता है, फिर राम कैसे मिले ? जिस तरह रवि और रजनी—दिन और रात—एकत्र नहीं होते, उसी तरह राम और काम एकत्र नहीं मिलते। जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है, वहाँ काम नहीं ।

तन को सब योगी करते हैं, पर मन को कोई ही योगी करता है । अगर मन योगी हो जाय, तो सहजमें सिद्धि मिल जाय । लोग गेरुवे कपड़े पहन लेते हैं, जटा रखा लेते हैं, हाथमें कमण्डल और बगल में भृगछाला ले लेते हैं—इस तरह योगी बन जाते हैं, पर मन उनका संसारी भोगोंमें ही लगा रहता है ; इसलिये उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—ईश्वर-दर्शन नहीं होता । अगर वे लोग कपड़े चाहेँ गृहस्थों के से ही पहनेँ, गृहस्थोंकी तरह ही खायें-पीवें ; पर मन को एक परमात्मामें रक्खें, तो निश्चय ही उन्हें भगवान् मिल जाय । जो मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता है, पर उसमें आसक्ति नहीं रखता, यानी जलमें कमलकी तरह रहता है, उसकी मुक्ति निश्चय ही हो जाती है ; पर जो संन्यासी होकर विषयोंमें आसक्ति रखता है, उसकी

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मोक्ष नहीं होती। राजा जनक गृहस्थीमें रहते थे; सब तरह के राजभोग भोगते थे; पर भोगोंमें उनकी आसक्ति नहीं थी, इसी से उनकी मुक्ति हो गई।

सारान्श—विषय-भोग, आयु और यौवनको अनित्य और क्षणभंगुर समझकर इनमें आसक्ति न रखो और मनको एकाग्र करके हरक्षण परमात्माका भजन करो—तो जन्म-मरणसे छुटकारा मिल जाय और परमानन्दकी प्राप्ति हो जाय। कबीरदासजी कहते हैं:—

कहा भरोसो देहको, विनति जाय छिन मैंहि ।

श्याम श्याम सुमिरन करो, और जतन कबु नाहि ॥

इस शरीरका क्या भरोसा? यह क्षण-भरमें नष्ट हो जाय। इस दशामें, सर्वात्तम उपाय यही है कि, हर साँस पर परमात्माका नाम लो। बिना उसके नामके कोई साँस न जाने पावे। बस, इससे बढ़कर उद्धारका और उपाय नहीं है।

कुण्डलिया ।

जेसे चंचल चंचला, लोहीं चंचल भोग ।

तैसेही यह आयु है, ज्यों घट पवन प्रयोग ।

चंचल = स्थिर, तरल, चपल। चञ्चला = बिजली, चपला। लोहीं = उसी तरह। भोग = स्त्री आदिका उपभोग। आयु = उम्र। घट =

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ज्यों घट पवन प्रयोग, तरल ल्यौही यौवन तन ।

विनसत लगत न वार, गहत हवै जात श्रोसकन ।

देख्यौ दुःसह दुःख, देहधारिनको ऐसे ।

साधत सन्त समाधि, व्याधि सों छूटत जैसे ॥५४॥

54. Enjoyments are short-lived like the flash of lightning in the midst of thick clouds. Life is transitory like the water vapors present in the clouds which are scattered away by the blowing of a heavy gale. Men's attempts to preserve their youth for a long time are also futile. Considering all these things, O wise men! It is only proper that you direct your attention at once to Yoga which is easy to practise provided you are possessed of the virtues of perseverance and meditation.

पुरये ग्रामे वने वा महति क्षितपटच्छत्तपालीं कपाली-

मादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतधुग्धुग्धुशोपकगटम् ॥

द्वारद्वारं पश्चतो वरमुदरदरीपूरणाय चूधातौ

मानी प्राणी स धन्यो न पुनरुद्वदिनं तुल्यकुल्येषुदीनः ॥५४॥

वह चूधातौ किन्तु मानी पुरुष, जो अपने पेटरूपी खंडुके भरने

घड़ा, कलशो, गगरो। पवन = हवा। तरल = अस्थिर, चल्चल। यौवन = जवानो। तन = शरीर। विनसत = नाश होते। वार = ढेर। गहत = पकड़ते हो। श्रोसकन = श्रोसके कथा, शबनसके कूतरे। दुःसह = जो सहा न जाने, असह। देहधारी = शरीरधारी, मनुष्य और पशुपक्षी आदि। सन्त = साधु, उत्तम मनुष्य। समाधि = ध्यान, योगकी क्रिया विशेष। व्याधि = रोग, दुःख, क्लेश।

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के लिए हाथमें पवित्र साफ़ कपड़े से ढका हुआ ठिकरा लेकर वन वन और गैव-गैव घूमता है और उनके दरवाजे पर जाता है, जिनकी चौखट न्यायतः विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराये हुए हवन के धूपसे मलिन हो रही है, अच्छा है; किन्तु वह अच्छा नहीं, जो समान कुलवालों के यहाँ जाकर मँगता है ॥५॥

तुलसीदासजीने भी कहा है—

घरमें भूखा पड़ रहे, दस फ़ाके हो जायँ ।

तुलसी मैया-बन्धुके, कबहुँ न मँगान जाय ॥

तुलसीदासजी कहते हैं, अगर मनुष्यके पास खानेको न हो, उसे उपवास करते-करते दस दिन बीत जायँ, अन्न बिना प्राण नाश होनेकी भी संभावना हो; तोभी उसे अपनी या अपने परिवारकी जीवन-रक्षाके लिए, कुछ मिलनेकी आशासे, भाई-बन्धुओंके पास हरगिज़ न जाना चाहिये। क्योंकि ऐसे मौके पर वे लोग उसका अपमान करते हैं। उस अपमानका दुःख भोजन बिना प्राण नाश होनेके दुःखसे अधिक दुःखदायी होता है। मृत्युकी यंत्रणाओंका सहना आसान है, पर उस अपमानको सहना कठिन है। और भी किसीने कहा है—

वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्र सेवितम् ।

द्रमालयः पक्षलाम्बु भोजनम् ॥

( २०० )

तृणानि शय्या परिधान बल्कलम् ।

न बन्धुमध्ये धनहीन जीवनम् ॥

व्याघ्र और हाथियोंसे भरे हुए जड़लमें रहना भला, वक्षोंके नीचे बसना भला, पके-पके फल खाना और जल पीना भला, वास पर सो रहना और डालोंके कपड़े पहन लेना भला ; पर साह्योंके बीचमें धनहीन होकर रहना भला नहीं ।

सोरठा ।

विप्रनेक घर जाय, भीख माँगिबौ है भलो ।

बन्धुन कौ सिरनाय, भोजनहु करिबौ बुरो ॥५५॥

55. Worthy of all praise is the hungry but proud man who for the sake of filling the empty pit of his stomach wanders from village to village or from forest to forest holding in his hand a broken earthen vessel covered with a clean piece of cloth, begging at doors the frames of which have been blackened by the smoke rising from the oblation-fires of learned Brahmins, but it is not proper to demean himself by asking people of equal birth for charity.

चाण्डालः क्रियं द्विजातिरथवा शत्रोऽथ किं तापसः

किं वा तत्त्वविवेकपेशलमतिर्योगीश्वरः कोऽपि किम् ॥

विप्रन = ब्राह्मणों । बन्धुन = साह्यों । सिर नाय = सिर नवाकर माँगिबौ = माँगला । करिबौ = करना ।

( २०१ )

इत्युपचविकल्पनरूपमुखैः सम्भाष्यमाणा जनै-

र्न कुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः ॥५६॥

यह चागडाल है या ब्राह्मण है ? यह शुद्ध है या तपस्वी है ? क्या यह तत्त्वविद् योगीश्वर है ?—लोगों द्वारा ऐसी अनेक प्रकार की संशय और तर्कयुक्त बातें सुनकर भी, योगी लोग न नाराज होते हैं न खुश ; वे तो सावधान चित्त से अपनी राह-राह चले जाते हैं ॥५६॥

योगिजन लोगोंकी बुरी-भली बातोंका खयाल नहीं करते ; कोई कुछ भी क्यों न कहा करे । चाहे उन्हें कोई शुद्ध कहे चाहे ब्राह्मण, चाहे भङ्गी और चाहे तपस्वी ; चाहे कोई निन्दा करे, चाहे स्तुति ; वे अच्छी बातसे प्रसन्न और बुरी बातसे अप्रसन्न नहीं होते । सच्चे महात्मा हर्ष-शोक, दुःख-सुख और मान-अपमान सबको समान समझते हैं ।

योगेश्वर कृष्णन “पीता”के दूसरे अध्यायमें कहा है—

दुःखेष्वनुद्विग्मनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥

जो दुःखके समय दुःखी नहीं होता ; जो राग, भय और क्रोधसे रहित है, वह “स्थितप्रज्ञ” मुनि है ।

बुद्धिमानको किसी भी बातकी परवा न करनी चाहिये । हाथा की तरह रहना चाहिये । हाथीके पीछे हजारों कुत्ते भूकते हैं,

( २०० )

तृष्णानि शय्या परिधान बल्कलम् ।

न बन्धुमध्ये धनहीन जीवनम् ॥

व्याघ्र और हाथियोंसे भरे हुए जड़ूलमें रहना भला, वक्षोंके नीचे बसना भला, पके-पके फल खाना और जल पीना भला, घास पर सो रहना और छालोंके कपड़े पहन लेना भला ; पर भाइयोंके बीचमें धनहीन होकर रहना भला नहीं ।

सोरटा ।

विप्रनके घर जाय, भीख माँगिबौ है भलो ।

बन्धुन कों सिरनाय, भोजनहु करिबौ बुरो ॥५५॥

55. Worthy of all praise the hungry but proud man who for the sake of filling the empty pit of his stomach wanders from village to village or from forest to forest, holding in his hand a broken earthen vessel covered with a clean piece of cloth, begging at doors the frames of which have been blackened by the smoke rising from the oblation-fires of learned Brahmans, but it is not proper to demean himself by asking people of equal birth for charity.

चाण्डालः किमयं द्विजातिरथवा शुद्रोऽथ किं तापसः

किं वा तत्त्वविवेकपेशलमतिर्योगीश्वरः कोऽपि किम् ॥

विप्रन=ब्राह्मणों। बन्धुन=भाइयों। सिर नाय=सिर नवाकर माँगिबो=माँगना। करिबो=करना।

( २०१ )

इत्युपविकल्पजल्पमुखैः सम्भाष्यमाणं जनै- र्न कुद्वाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः ॥५६॥

यह चाशडाल है या ब्राह्मण है ? यह शुद्ध है या तपस्वी है ? क्या यह तत्त्वविद् योगीश्वर है ?—लोगों द्वारा ऐसी अनेक प्रकार की संशय और तर्कयुक्त बातें सुनकर भी, योगी लोग न नाराज़ होते हैं न खुश ; वे तो सावधान चित्त से अपनी राह-राह चले जाते हैं ॥५६॥

योगिजन लोगोंकी बुरी-भली बातोंका खयाल नहीं करते ; कोई कुछ भी क्यों न कहा करे । चाहे उन्हें कोई शुद्ध कहे चाहे ब्राह्मण, चाहे भक्ती और चाहे तपस्वी ; चाहे कोई निन्दा करे, चाहे स्तुति ; वे अच्छी बातसे प्रसन्न और बुरी बातसे अप्रसन्न नहीं होते । सच्चे महात्मा हर्ष-शोक, दुःख-सुख और मान-अपमान सबको समान समझते हैं ।

योगेश्वर कृष्णन “गीता”के दूसरे अध्यायमें कहा है—

दुःखेष्वनुद्विगमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥

जो दुःखके समय दुःखी नहीं होता ; जो राग, भय और क्रोधसे रहित है, वह “स्थितप्रज्ञ” मुनि है ।

बुद्धिमानको किसी भी बातकी परवा न करनी चाहिये । हाथा की तरह रहना चाहिये । हाथीके पीछे हजाराँ कुत्ते भूकते हैं,

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पर वह उनकी तरफ देखता भी नहीं। महात्मा कबीर दास कहते हैं:—

हस्ती चढ़िये ज्ञानके, सहज हुलीचा डारि । स्वान-रूप संसार है, भूसनदे भकमारि ॥

“कबिरा” काहेको डैरे, सिर पर सिरजनहार ? । हस्ती चढ़ डुरिये नहीं, क्रूर भूसे हंजार ॥

महाकवि रहीम कहते हैं:—

जो बडेनकों लघु कहौं, नहि “रहीम” घट जाहि ।

गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहि ।

सज्जन चित्त कबहुँ न धरत, दुर्जन जनके बोल ।

पाहन मारे आमकों, तउ फल देत अमोल ॥

आप ज्ञान-रूपी हाथी पर चढ़ कर मस्त हो जाओ; किसी की परवा मत करो; बकनेवालोंको बकने दो। यह संसार कुत्तेकी तरह है। इसे भौंकने दो। भकमार कर आप ही रह जायगा। देखते हो, जब हाथी निकलता है, सैकड़ों कुत्ते उसके पीछे-पीछे भू कते हैं; पर वह अपनी स्वाभाविक चालसे, मस्त हुआ, शानके साथ चला जाता है—कुत्तोंकी तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखता। वह तो चला ही जाता है और कुत्ते भी भकमारके चुप हो जाते हैं। मतलब यह है, कि

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तुम अच्छी राहपर चलो, संसारकी बुरी-भली बातों पर कान मत दो। हाथोंका अनुकरण करो।

करींदास कहते हैं, अरे मनुष्य! तू क्यों डरता है, जब कि तेरे सिर पर तेरा बनाने वाला मौजूद है? हाथों पर चढ़ कर भागना उचित नहीं, चाहे हज़ारों कुत्ते क्यों न भूँके। मतलब यह कि तुमने जो उत्तम पन्थ अक्षर्यार किया है, लोगोंके बुरा-भला कहनेसे उसे मत त्यागो। संसारी कुत्तासे न डरो, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा।

रहीम कवि कहते हैं, बड़ोंको छोटा कहनेसे बड़े छोटे नहीं हो जाते—वे तो बड़े ही रहते हैं। गिरिराज या गोवर्द्धन पर्वतको अपने छोटी उँगली पर उठानेवाले—अतुल पराक्रम दिखानेवाले कृष्णको लोग गिरिधरकी जगह मुरली या बाँसकी बाँसुरी धारण करनेवाले मुरलीधर कहते हैं, लेकिन वे बुरा नहीं मानते।

सज्जन लोग दुष्टोंकी कड़वी बातों या बोली-टोलियोंका ख्याल ही नहीं करते। लोग आमके वृक्षके पत्थर मारते हैं, तो-भी वह अनमोल फल ही देता है।

दोहा ।

त्रिप शूद्र योगी तपी, सुपत्त कहत कर टोक ।

सवकी बातें सुनत हों, मोकों हर्ष न शोक । ॥५॥

त्रिप=ब्राह्मण । शूद्र=हिन्दुओंको चौथा वर्ग ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और

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56. Yogis or ascetics are neither angry nor pleased with the men who, when they are going on their way, accost them with various epithets such as, "Is he a low-born fellow ?" or "Is he one of a twice-born caste ?" or "Is he a Shudra ?" or "Is he one engaged in the practice of Tapa ?" or "Is he a great Yogi, wise in the realisation of Truth ?"

सखे धन्याः केचित्तुऽदितभवन्यव्यतिकरा

वनान्ते धिन्तान्तर्विषमविषयाशीविषगताः ॥

शरच्चन्द्रन्योत्खाद्यवलगना भोगमुभगां

नयन्ते ये रात्रिं सुकृतचयचितैकशरणाः ॥५७॥

हे मित्र ! वे पुरुष धन्य हैं, जो शरद् के चन्द्रना की चाँदनी से सफेद हुए आकाशमण्डल से सुन्दर और मनोहर रातको वनमें बिताते हैं, जिन्होंने संसार-वन्यन का काट दिया है, जिनके अन्तः-कार्य से भयानक सर्प-रूपी विषय निकल गये हैं और जो सुकर्मों को ही अपना रक्षक समझते हैं ॥५७॥

वे ही लोग सुखी हैं, वे ही धन्य हैं, जो शरद् की चाँदनी की मनोहर रातमें वनमें बैठे हुए परमात्माका भजन करते हैं, जिन्होंने संसारके जञ्जालोंको काट दिया है, जिन्होंने आशा-

वैश्योंको चाकरी करने वाली जाति। योगी=जोगी। तपी=तपस्वी। रूपच=श्वपच=चापडाल। कहत=कहते हैं। कर ठोक=ताली बजाकर। मोकों=मुके। इर्ष न शोक=खुशी होती है न रज्जु; विष कहनेसे खुशी नहीं होती और शूद्र कहनेसे रज्जु नहीं होता।

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तृष्णा और राग-द्वेष प्रभृतिको त्याग दिया है, जिनके भोतरी दिलसे विषय रूपी विषैले सर्प भाग गये हैं ; यानी जिह्वा ने विषयो को विषकी तरह दूर कर दिया है, जिनका चित्त केवल पुण्य और परोपकारमें ही लगा रहता है ।

हमें संसारकी प्रत्येक चीजसे परोपकारकी शिक्षा मिलती है । वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते, नदियाँ आप जल नहीं पीतीं, सूरज और चाँद अपने लिये नहीं दूमते, बादल अपने लिये मेह नहीं बरसाते,—ये सब पराये लिए कष्ट सहते हैं । हातिम और विक्रमने पराये लिये नाना प्रकारके कष्ट उठाये, दधोचि और शिविने परोपकारके लिये अपने-अपने शरीर भी दे दिये, हरिश्चन्द्रने पराये लिये घोर दुःसह विपत्ति भोगी । जिनका जीवन परोपकारमें बीतता है, उन्हीं का जीवन धन्य है । श्रेष्ठ सादीने "गुलिस्ताँ"में कहा है—

चूँ इन्साँरा न वाशद फ़ज़लो ऐहँसा ।

चे फ़र्कज़ आदमी ता नक्श दीवार ॥

यदि मनुष्यमें परोपकार करने की इच्छा नहीं है, तो उसमें और दीवार पर खिंचे हुए चित्रमें क्या फ़र्क है ?

जिससे प्राणी मात्रका भला हो, वही मनुष्य धन्य है । उसीकी माँका पुत्र जनना सार्थक है । "रहीम" कवि कहते हैं—

वडे दीनको दुख सुने देत दया उर आनि ।

हरि हाथी सोंकव हती, कहू "रहीम" पहिचानि ? ॥

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धनि “रहीम” जल पंकको, लघु जिय पियत अघाय ।

उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाय ? ।।

बड़े लोग दीन और दस्त्रिओं, निरक्ष और दुखियों एवं म्लान और भीतोंकी यानी खोफ़्जदोंकी बातें सुनते हैं, उनकी दुःख-गाथाओं पर कान देते हैं; फिर हृदयमें तरस खाकर—दया करके उन्हें कुछ देते और उनका दुःख दूर करते हैं । वे इस बातको नहीं देखते कि, यह हमारी जान-पहचानका है या नहीं; यह हमारा अपना आदमी है या ग़ैर है । देखिये, हाथी और भगवान्की पहचान नहीं थी । फिर भी ज्योंही भगवान्को खबर मिली कि, गजराजका पैर मगरने पकड़ लिया है, अब गजका जीवन शेष होना चाहता है, उसने खूब जोर मार लिया है, उसे अपनी रक्षाकी ज़रू भी आंशा नहीं, इसलिये अब वह तुझे पुकार रहा है; त्योंही जान-पहचान न होने पर भी, भगवान् जल्दीके मारे नंगे पैरों भागे और हाथीकी जान बचायी । गज और ग्राहकी बात मशहूर है ।

मतलब यह है, कि जिससे दूसरों की भलाई हो, दूसरोंका दुःख दूर हो वही बड़ा है । वह बड़ा—बड़ा नहीं, जिससे दूसरोंका उपकार न हो । जो दीनोंपर दया करते हैं, दीनोंके दुःख दूर करते हैं, दीनोंकी पालना और रक्षा करते हैं; वे ही बड़े कहलाने योग्य हैं । भगवान्में ये गुण पूर्ण रूपसे हैं ; इसीसे उन्हें दीनदयालु, दीर्धबन्धु, दीननाथ, दीनवत्सल, दीनपालक और दीनरक्षक आदि कहते हैं । मनुष्यको भगवान्

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ने अपने ही जैसा बनाया है। वे चाहते हैं, कि मनुष्य मेरा अनुकरण करे; दीन-दुखियोंके दुःख दूर करे, संकटमें उनकी सहायता करे, मुसीबतमें उन्हें मदद दे। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, उन्हें भी संसार दीनबन्धु आदि पदवियाँ देता और सबसे बड़े दीनबन्धु उससे प्रसन्न होकर, उसकी सारी कल्पनाओं को मिटा देते हैं।

रहाम कवि कहते हैं,—कीखड़का पानी धन्य है, जिसे छोटे-छोटे जीव—कीड़े-मकाड़े घाषकर पीते हैं। समुद्र चाहे जितना बड़ा है, पर उसमें तारीफ़की कोई बात नहीं, क्योंकि उसके पास जाकर किसीकी प्यास नहीं बुझती; जो भी जाता है, उसके पाससे प्यासा ही लौटता है।

दोहा ।

ते नर जगमें धन्य हैं, शरदशुभ्र निशि माहिं । तोड़े वन्यन जगतके, मनते विषयन काहि ॥५७॥

सोरठा ।

विषय-सर्पको मारि, चित्त लगाय शुभ कर्ममें । पुरयकर्म शुभधारि, त्यागे सब मन-वासना ॥५७॥

ते=वे। नर=पुरुष। धन्य=भार्यवान्=पुरयवान्। शरद=शरद श्रुतु=क्वार और कातिक। शुभ्र=सफेद। निशि=रात। शुभ्र निशि= चाँदनी रात। सांहि=में। वन्यन=कूद, गाँठ, गिरह, बेड़ी। मनते=

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57, O friend ! happy are those who spent their nights made beautiful by the bright autumn moon-light spreading over the expanse of the heavens, seated in a corner of a forest, their tight worldly bonds broken asunder, the poison of their snake-like passions removed from inside their minds and their hearts resting under the shelter of a multitude of good actions done in the course of their life.

एतस्माद्विरमेन्द्रियार्थं गहनादायासदादाशु च

श्रेयोमार्गमशेषदुःखशमनव्यापारदंजनंक्षणम् ॥

शान्तिं भावमुपैहि संत्यज निजां कल्लोललोलां मतिं

नृणो मा भज भंगुर्गा भवरति चेतः प्रसीदाधुना ॥५८॥

हे चित्त ! अब विश्राम ले, इन्द्रियोंके सुख सम्पादन के लिये विषयोंकी खोज में कठोर परिश्रम न कर ; आन्तरिक शान्ति की चेष्टा कर, जिससे कल्याण हो और दुःखों का नाश हो ; तरंग के समान चक्कुल चालको छोड़ दे ; संसारी पदार्थों में और सुख न मान ; क्योंकि ये असार और नाशमान हैं । बहुत कहना व्यर्थ है, अब तू अपने आत्मामें ही सुख मान ॥५८॥

अरे दिल ! अब तू इन्द्रियोंके लिए विषय-सुखोंकी खोज में मत भरम, उनके लिए तकलीफ न उठा, शान्त हो जा ; उनमें

मनसे । विषयन=विषयोंको । काहि=काङ्क्षि, निकालकर । शुभ=मंगल, कल्याण, भला । पुण्यकर्म=पवित्र कर्म । धारि=धारण करने । वासना=इच्छा, अभिलाष ; मनोरथ ।

( २०६ )

कुछ भी सुख नहीं है, वे तो विपक्षे भी बुरे और काले नाग से भी भयङ्कर हैं। अरे ! अब तो मेरा कहना मान और अपनी चालोंको छोड़। देख, तेरे सिर पर काल मँडरा रहा है। वह एक ही बारमें तुझे निगल जायगा। अरे मैथ्या, ये इन्द्रियाँ बड़ी ख़राब हैं, इनमें दया-मया नहीं, यह शैतानकी तरह कुराह पर ले जाती हैं। तू इनसे सावधान रह और इनके भुलावे में न आ। अब शान्त हो और कुछ सहना सीख। अपनी बंचल चाल छोड़, जगतको असार और स्वप्नवत् समझ। इस जञ्जाल से अलग हो। बारम्बार इसी की इच्छा न कर। अपने आत्मामें ही मग्न हो। इस तरह अवश्य तेरा कल्याण होगा।

कल्याण कैसा ? जब तू ज्योतिःस्वरूप आत्माको देख लेगा, तब तू उसीमें सन्तुष्ट रहेगा, उससे कभी न डिगेगा, उसके आगे और सब लाभ तुझे हेच जँचेंगे। योगेश्वर कृष्णने ऐसी ही बात गीताके छठे अध्यायमें कही है। उस सुखको सब नहीं जान सकते, जो अनुभव करता है वही जानता है। उसे कोई कह कर बता नहीं सकता। कबीरदास कहते हैं :—

ज्यों नर नारीके स्वादको, खसी नहीं पहचान ।

त्यों ज्ञानीके सुखको, अज्ञानी नहीं जान ॥

खी-पुरुषके सुख को जैसे हींजड़ा नहीं जान सकता, वैसे ही ज्ञानीके सुखको अज्ञानी नहीं जान सकता ।

१४

( २१० )

व्यप्य ।

पूरे चित्त ! कर कृपा, त्याग तू अपनी चालहि ।

शिर पर नाचत खड़बौ, जान तू ऐसे कालहि ।

ये इन्द्रियगण निडुर, मान मत इनको कहिबौ ।

शान्तभाव कर यहण, सीख कठिनाई सहिबौ ।

निजमति तरंग-सम चपल तजि, नाशवान जग जानिये ।

जनि करहु तासु इच्छा कहु, शिव-स्वरूप उर आनिये ॥५८॥

58. O mind, do thou take rest now from thy laborious efforts in acquiring the object of sensual pleasures, have recourse to internal peace which is the only way to bliss and which removes all sorts of afflictions, give up thy current-like restlessness and never again take pleasure in worldly things which are liable to destruction. In short, do thou now be pleased with thy own self.

पूरे=सम्बोधन । पूरे चित्त=ए मन ! त्याग=छोड़, । चालहि=चालको, चलनगतिको । कालहि=मौतको । इन्द्रियगण=आँख, कान, नाक, जीभ और चमड़ा ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं । निडुर=निर्दयी, बेरहम । कहिबो=कहना, सलाह । शान्तभाव=अचञ्चलभाव, अचुञ्चभाव । कठिनाई=तकलीफें । सहिबो=सहना, बर्दाश्त करना । निज गति=अपनी चाल । तरंग=लहर । सम=समान । तजि=छोड़ । नाशवान=नाश होने वाला । जग=जगत् । जड़ि करहु=मत करो । ताछ=उसकी । शिव=महादेव, मङ्गल, शुभ, कल्याण । उर=हृदय, दिल । आनिये=लाइये ।