वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 648 में से
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तृष्णा और राग-द्वेष प्रभृतिको त्याग दिया है, जिनके भोतरी दिलसे विषय रूपी विषैले सर्प भाग गये हैं ; यानी जिह्वा ने विषयो को विषकी तरह दूर कर दिया है, जिनका चित्त केवल पुण्य और परोपकारमें ही लगा रहता है ।
हमें संसारकी प्रत्येक चीजसे परोपकारकी शिक्षा मिलती है । वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते, नदियाँ आप जल नहीं पीतीं, सूरज और चाँद अपने लिये नहीं दूमते, बादल अपने लिये मेह नहीं बरसाते,—ये सब पराये लिए कष्ट सहते हैं । हातिम और विक्रमने पराये लिये नाना प्रकारके कष्ट उठाये, दधोचि और शिविने परोपकारके लिये अपने-अपने शरीर भी दे दिये, हरिश्चन्द्रने पराये लिये घोर दुःसह विपत्ति भोगी । जिनका जीवन परोपकारमें बीतता है, उन्हीं का जीवन धन्य है । श्रेष्ठ सादीने "गुलिस्ताँ"में कहा है—
चूँ इन्साँरा न वाशद फ़ज़लो ऐहँसा ।
चे फ़र्कज़ आदमी ता नक्श दीवार ॥
यदि मनुष्यमें परोपकार करने की इच्छा नहीं है, तो उसमें और दीवार पर खिंचे हुए चित्रमें क्या फ़र्क है ?
जिससे प्राणी मात्रका भला हो, वही मनुष्य धन्य है । उसीकी माँका पुत्र जनना सार्थक है । "रहीम" कवि कहते हैं—
वडे दीनको दुख सुने देत दया उर आनि ।
हरि हाथी सोंकव हती, कहू "रहीम" पहिचानि ? ॥