वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०६ )
धनि “रहीम” जल पंकको, लघु जिय पियत अघाय ।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाय ? ।।
बड़े लोग दीन और दस्त्रिओं, निरक्ष और दुखियों एवं म्लान और भीतोंकी यानी खोफ़्जदोंकी बातें सुनते हैं, उनकी दुःख-गाथाओं पर कान देते हैं; फिर हृदयमें तरस खाकर—दया करके उन्हें कुछ देते और उनका दुःख दूर करते हैं । वे इस बातको नहीं देखते कि, यह हमारी जान-पहचानका है या नहीं; यह हमारा अपना आदमी है या ग़ैर है । देखिये, हाथी और भगवान्की पहचान नहीं थी । फिर भी ज्योंही भगवान्को खबर मिली कि, गजराजका पैर मगरने पकड़ लिया है, अब गजका जीवन शेष होना चाहता है, उसने खूब जोर मार लिया है, उसे अपनी रक्षाकी ज़रू भी आंशा नहीं, इसलिये अब वह तुझे पुकार रहा है; त्योंही जान-पहचान न होने पर भी, भगवान् जल्दीके मारे नंगे पैरों भागे और हाथीकी जान बचायी । गज और ग्राहकी बात मशहूर है ।
मतलब यह है, कि जिससे दूसरों की भलाई हो, दूसरोंका दुःख दूर हो वही बड़ा है । वह बड़ा—बड़ा नहीं, जिससे दूसरोंका उपकार न हो । जो दीनोंपर दया करते हैं, दीनोंके दुःख दूर करते हैं, दीनोंकी पालना और रक्षा करते हैं; वे ही बड़े कहलाने योग्य हैं । भगवान्में ये गुण पूर्ण रूपसे हैं ; इसीसे उन्हें दीनदयालु, दीर्धबन्धु, दीननाथ, दीनवत्सल, दीनपालक और दीनरक्षक आदि कहते हैं । मनुष्यको भगवान्