भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

( २०७ )

ने अपने ही जैसा बनाया है। वे चाहते हैं, कि मनुष्य मेरा अनुकरण करे; दीन-दुखियोंके दुःख दूर करे, संकटमें उनकी सहायता करे, मुसीबतमें उन्हें मदद दे। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, उन्हें भी संसार दीनबन्धु आदि पदवियाँ देता और सबसे बड़े दीनबन्धु उससे प्रसन्न होकर, उसकी सारी कल्पनाओं को मिटा देते हैं।

रहाम कवि कहते हैं,—कीखड़का पानी धन्य है, जिसे छोटे-छोटे जीव—कीड़े-मकाड़े घाषकर पीते हैं। समुद्र चाहे जितना बड़ा है, पर उसमें तारीफ़की कोई बात नहीं, क्योंकि उसके पास जाकर किसीकी प्यास नहीं बुझती; जो भी जाता है, उसके पाससे प्यासा ही लौटता है।

दोहा ।

ते नर जगमें धन्य हैं, शरदशुभ्र निशि माहिं । तोड़े वन्यन जगतके, मनते विषयन काहि ॥५७॥

सोरठा ।

विषय-सर्पको मारि, चित्त लगाय शुभ कर्ममें । पुरयकर्म शुभधारि, त्यागे सब मन-वासना ॥५७॥

ते=वे। नर=पुरुष। धन्य=भार्यवान्=पुरयवान्। शरद=शरद श्रुतु=क्वार और कातिक। शुभ्र=सफेद। निशि=रात। शुभ्र निशि= चाँदनी रात। सांहि=में। वन्यन=कूद, गाँठ, गिरह, बेड़ी। मनते=