वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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57, O friend ! happy are those who spent their nights made beautiful by the bright autumn moon-light spreading over the expanse of the heavens, seated in a corner of a forest, their tight worldly bonds broken asunder, the poison of their snake-like passions removed from inside their minds and their hearts resting under the shelter of a multitude of good actions done in the course of their life.
एतस्माद्विरमेन्द्रियार्थं गहनादायासदादाशु च
श्रेयोमार्गमशेषदुःखशमनव्यापारदंजनंक्षणम् ॥
शान्तिं भावमुपैहि संत्यज निजां कल्लोललोलां मतिं
नृणो मा भज भंगुर्गा भवरति चेतः प्रसीदाधुना ॥५८॥
हे चित्त ! अब विश्राम ले, इन्द्रियोंके सुख सम्पादन के लिये विषयोंकी खोज में कठोर परिश्रम न कर ; आन्तरिक शान्ति की चेष्टा कर, जिससे कल्याण हो और दुःखों का नाश हो ; तरंग के समान चक्कुल चालको छोड़ दे ; संसारी पदार्थों में और सुख न मान ; क्योंकि ये असार और नाशमान हैं । बहुत कहना व्यर्थ है, अब तू अपने आत्मामें ही सुख मान ॥५८॥
अरे दिल ! अब तू इन्द्रियोंके लिए विषय-सुखोंकी खोज में मत भरम, उनके लिए तकलीफ न उठा, शान्त हो जा ; उनमें
मनसे । विषयन=विषयोंको । काहि=काङ्क्षि, निकालकर । शुभ=मंगल, कल्याण, भला । पुण्यकर्म=पवित्र कर्म । धारि=धारण करने । वासना=इच्छा, अभिलाष ; मनोरथ ।