भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

( २०६ )

कुछ भी सुख नहीं है, वे तो विपक्षे भी बुरे और काले नाग से भी भयङ्कर हैं। अरे ! अब तो मेरा कहना मान और अपनी चालोंको छोड़। देख, तेरे सिर पर काल मँडरा रहा है। वह एक ही बारमें तुझे निगल जायगा। अरे मैथ्या, ये इन्द्रियाँ बड़ी ख़राब हैं, इनमें दया-मया नहीं, यह शैतानकी तरह कुराह पर ले जाती हैं। तू इनसे सावधान रह और इनके भुलावे में न आ। अब शान्त हो और कुछ सहना सीख। अपनी बंचल चाल छोड़, जगतको असार और स्वप्नवत् समझ। इस जञ्जाल से अलग हो। बारम्बार इसी की इच्छा न कर। अपने आत्मामें ही मग्न हो। इस तरह अवश्य तेरा कल्याण होगा।

कल्याण कैसा ? जब तू ज्योतिःस्वरूप आत्माको देख लेगा, तब तू उसीमें सन्तुष्ट रहेगा, उससे कभी न डिगेगा, उसके आगे और सब लाभ तुझे हेच जँचेंगे। योगेश्वर कृष्णने ऐसी ही बात गीताके छठे अध्यायमें कही है। उस सुखको सब नहीं जान सकते, जो अनुभव करता है वही जानता है। उसे कोई कह कर बता नहीं सकता। कबीरदास कहते हैं :—

ज्यों नर नारीके स्वादको, खसी नहीं पहचान ।

त्यों ज्ञानीके सुखको, अज्ञानी नहीं जान ॥

खी-पुरुषके सुख को जैसे हींजड़ा नहीं जान सकता, वैसे ही ज्ञानीके सुखको अज्ञानी नहीं जान सकता ।

१४