वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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56. Yogis or ascetics are neither angry nor pleased with the men who, when they are going on their way, accost them with various epithets such as, "Is he a low-born fellow ?" or "Is he one of a twice-born caste ?" or "Is he a Shudra ?" or "Is he one engaged in the practice of Tapa ?" or "Is he a great Yogi, wise in the realisation of Truth ?"
सखे धन्याः केचित्तुऽदितभवन्यव्यतिकरा
वनान्ते धिन्तान्तर्विषमविषयाशीविषगताः ॥
शरच्चन्द्रन्योत्खाद्यवलगना भोगमुभगां
नयन्ते ये रात्रिं सुकृतचयचितैकशरणाः ॥५७॥
हे मित्र ! वे पुरुष धन्य हैं, जो शरद् के चन्द्रना की चाँदनी से सफेद हुए आकाशमण्डल से सुन्दर और मनोहर रातको वनमें बिताते हैं, जिन्होंने संसार-वन्यन का काट दिया है, जिनके अन्तः-कार्य से भयानक सर्प-रूपी विषय निकल गये हैं और जो सुकर्मों को ही अपना रक्षक समझते हैं ॥५७॥
वे ही लोग सुखी हैं, वे ही धन्य हैं, जो शरद् की चाँदनी की मनोहर रातमें वनमें बैठे हुए परमात्माका भजन करते हैं, जिन्होंने संसारके जञ्जालोंको काट दिया है, जिन्होंने आशा-
वैश्योंको चाकरी करने वाली जाति। योगी=जोगी। तपी=तपस्वी। रूपच=श्वपच=चापडाल। कहत=कहते हैं। कर ठोक=ताली बजाकर। मोकों=मुके। इर्ष न शोक=खुशी होती है न रज्जु; विष कहनेसे खुशी नहीं होती और शूद्र कहनेसे रज्जु नहीं होता।