वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०३ )
तुम अच्छी राहपर चलो, संसारकी बुरी-भली बातों पर कान मत दो। हाथोंका अनुकरण करो।
करींदास कहते हैं, अरे मनुष्य! तू क्यों डरता है, जब कि तेरे सिर पर तेरा बनाने वाला मौजूद है? हाथों पर चढ़ कर भागना उचित नहीं, चाहे हज़ारों कुत्ते क्यों न भूँके। मतलब यह कि तुमने जो उत्तम पन्थ अक्षर्यार किया है, लोगोंके बुरा-भला कहनेसे उसे मत त्यागो। संसारी कुत्तासे न डरो, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा।
रहीम कवि कहते हैं, बड़ोंको छोटा कहनेसे बड़े छोटे नहीं हो जाते—वे तो बड़े ही रहते हैं। गिरिराज या गोवर्द्धन पर्वतको अपने छोटी उँगली पर उठानेवाले—अतुल पराक्रम दिखानेवाले कृष्णको लोग गिरिधरकी जगह मुरली या बाँसकी बाँसुरी धारण करनेवाले मुरलीधर कहते हैं, लेकिन वे बुरा नहीं मानते।
सज्जन लोग दुष्टोंकी कड़वी बातों या बोली-टोलियोंका ख्याल ही नहीं करते। लोग आमके वृक्षके पत्थर मारते हैं, तो-भी वह अनमोल फल ही देता है।
दोहा ।
त्रिप शूद्र योगी तपी, सुपत्त कहत कर टोक ।
सवकी बातें सुनत हों, मोकों हर्ष न शोक । ॥५॥
त्रिप=ब्राह्मण । शूद्र=हिन्दुओंको चौथा वर्ग ; ब्राह्मण, क्षत्रिय और