वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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पर वह उनकी तरफ देखता भी नहीं। महात्मा कबीर दास कहते हैं:—
हस्ती चढ़िये ज्ञानके, सहज हुलीचा डारि । स्वान-रूप संसार है, भूसनदे भकमारि ॥
“कबिरा” काहेको डैरे, सिर पर सिरजनहार ? । हस्ती चढ़ डुरिये नहीं, क्रूर भूसे हंजार ॥
महाकवि रहीम कहते हैं:—
जो बडेनकों लघु कहौं, नहि “रहीम” घट जाहि ।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहि ।
सज्जन चित्त कबहुँ न धरत, दुर्जन जनके बोल ।
पाहन मारे आमकों, तउ फल देत अमोल ॥
आप ज्ञान-रूपी हाथी पर चढ़ कर मस्त हो जाओ; किसी की परवा मत करो; बकनेवालोंको बकने दो। यह संसार कुत्तेकी तरह है। इसे भौंकने दो। भकमार कर आप ही रह जायगा। देखते हो, जब हाथी निकलता है, सैकड़ों कुत्ते उसके पीछे-पीछे भू कते हैं; पर वह अपनी स्वाभाविक चालसे, मस्त हुआ, शानके साथ चला जाता है—कुत्तोंकी तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखता। वह तो चला ही जाता है और कुत्ते भी भकमारके चुप हो जाते हैं। मतलब यह है, कि