भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २०१ )

इत्युपचविकल्पनरूपमुखैः सम्भाष्यमाणा जनै-

र्न कुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः ॥५६॥

यह चागडाल है या ब्राह्मण है ? यह शुद्ध है या तपस्वी है ? क्या यह तत्त्वविद् योगीश्वर है ?—लोगों द्वारा ऐसी अनेक प्रकार की संशय और तर्कयुक्त बातें सुनकर भी, योगी लोग न नाराज होते हैं न खुश ; वे तो सावधान चित्त से अपनी राह-राह चले जाते हैं ॥५६॥

योगिजन लोगोंकी बुरी-भली बातोंका खयाल नहीं करते ; कोई कुछ भी क्यों न कहा करे । चाहे उन्हें कोई शुद्ध कहे चाहे ब्राह्मण, चाहे भङ्गी और चाहे तपस्वी ; चाहे कोई निन्दा करे, चाहे स्तुति ; वे अच्छी बातसे प्रसन्न और बुरी बातसे अप्रसन्न नहीं होते । सच्चे महात्मा हर्ष-शोक, दुःख-सुख और मान-अपमान सबको समान समझते हैं ।

योगेश्वर कृष्णन “पीता”के दूसरे अध्यायमें कहा है—

दुःखेष्वनुद्विग्मनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥

जो दुःखके समय दुःखी नहीं होता ; जो राग, भय और क्रोधसे रहित है, वह “स्थितप्रज्ञ” मुनि है ।

बुद्धिमानको किसी भी बातकी परवा न करनी चाहिये । हाथा की तरह रहना चाहिये । हाथीके पीछे हजारों कुत्ते भूकते हैं,