भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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माला जपते हैं, गोमुखीमें सड़ा-सड़ हाथ चलाते हैं, “गीता” और “विष्णु सहस्रनाम” प्रभृतिका पाठ करते हैं और बीच-बीचमें कारोबारकी बातें भी करते रहते हैं अथवा स्त्री-बच्चोंके भगड़े निपटाया करते हैं। ऐसे भजन करने और माला फेरने से कोई लाभ नहीं। इस तरह सग्य बुथा नष्ट होता है। मन के एक ठौर हुए विना, शान्त और स्थिर हुए विना सब बुथा है। महात्मा कबीर ने ठाक ही कहा है :—

जेती लहर समुद्रकी, तेती मनकी दौरि । सहजै हीरा ऊपजे, जो मन आवै दौरि ॥ माला फेरत युग गया, पाया न मनका फेर । करका मनका छौड़िके, मन का मनका फेर ॥ भूँड सुड़ावत दिन गये, अजहूँ न मिलिया राम । राम नाम कहो क्या करै, मनके औरै काम ॥ तनको योगी सब करें, मनको चिरला कोय । सहजै सब विधि पाइये, जो मन योगी होय ॥

जितनी समुद्रकी लहरें हैं; उतनी ही मन की दौड़ है। अगर मन ठिकाने आजाय, उसमें समुद्र की सौ तरंगें न उठ, तो सहजमें हीरा पैदा हो जाय; यानी परमात्मा मिल जाय।

माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मनका फेर न मिला; अतः हाथ का मनिया छोड़कर, मनका मनिया फेर। हाथ

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