भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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की माला फेरनेसे कोई लाभ नहीं ; लाभ है मन की माला फेरने में । मन लगाकर एक बार भी ईश्वरको याद करनेसे बड़ा फल मिलता है ; पर ऋद्धवल चित्त से दिन-रात माला फेरने से भी कुछ नहीं मिलता ।

मूँड-मुँडाते अनेक दिन हो गये, पर आज तक भगवान् न मिले । मिले कैसे ? मन राममें लगे, तब तो राम मिले । मन तो विषय-भोगोंमें लगा रहता है, फिर राम कैसे मिले ? जिस तरह रवि और रजनी—दिन और रात—एकत्र नहीं होते, उसी तरह राम और काम एकत्र नहीं मिलते। जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है, वहाँ काम नहीं ।

तन को सब योगी करते हैं, पर मन को कोई ही योगी करता है । अगर मन योगी हो जाय, तो सहजमें सिद्धि मिल जाय । लोग गेरुवे कपड़े पहन लेते हैं, जटा रखा लेते हैं, हाथमें कमण्डल और बगल में भृगछाला ले लेते हैं—इस तरह योगी बन जाते हैं, पर मन उनका संसारी भोगोंमें ही लगा रहता है ; इसलिये उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—ईश्वर-दर्शन नहीं होता । अगर वे लोग कपड़े चाहेँ गृहस्थों के से ही पहनेँ, गृहस्थोंकी तरह ही खायें-पीवें ; पर मन को एक परमात्मामें रक्खें, तो निश्चय ही उन्हें भगवान् मिल जाय । जो मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता है, पर उसमें आसक्ति नहीं रखता, यानी जलमें कमलकी तरह रहता है, उसकी मुक्ति निश्चय ही हो जाती है ; पर जो संन्यासी होकर विषयोंमें आसक्ति रखता है, उसकी