भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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मोक्ष नहीं होती। राजा जनक गृहस्थीमें रहते थे; सब तरह के राजभोग भोगते थे; पर भोगोंमें उनकी आसक्ति नहीं थी, इसी से उनकी मुक्ति हो गई।

सारान्श—विषय-भोग, आयु और यौवनको अनित्य और क्षणभंगुर समझकर इनमें आसक्ति न रखो और मनको एकाग्र करके हरक्षण परमात्माका भजन करो—तो जन्म-मरणसे छुटकारा मिल जाय और परमानन्दकी प्राप्ति हो जाय। कबीरदासजी कहते हैं:—

कहा भरोसो देहको, विनति जाय छिन मैंहि ।

श्याम श्याम सुमिरन करो, और जतन कबु नाहि ॥

इस शरीरका क्या भरोसा? यह क्षण-भरमें नष्ट हो जाय। इस दशामें, सर्वात्तम उपाय यही है कि, हर साँस पर परमात्माका नाम लो। बिना उसके नामके कोई साँस न जाने पावे। बस, इससे बढ़कर उद्धारका और उपाय नहीं है।

कुण्डलिया ।

जेसे चंचल चंचला, लोहीं चंचल भोग ।

तैसेही यह आयु है, ज्यों घट पवन प्रयोग ।

चंचल = स्थिर, तरल, चपल। चञ्चला = बिजली, चपला। लोहीं = उसी तरह। भोग = स्त्री आदिका उपभोग। आयु = उम्र। घट =