वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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है, समुद्रमें जिसका शरीर बार सौ कोस लम्बा-चौड़ा है, उसको भी प्रभु भोजन पहुँचाते हैं, इसमें जरा भी शक नहीं। संसारमें कोई भी भूखा नहीं रहता। वह जगदीश चींटी और हाथी सबका पेट भरते हैं। अरे शठ! विश्वास क्यों नहीं रखता? सुन्दरदासजी कहते हैं, मैंने तुझे यह बात बारम्बार कितनी बार नहीं समझाई है?
( २ )
अरे! तू दशों दिशाओंमें क्यों भागा फिरता है? तू भगवान्के किये हुए कामोंका खयाल कर। देख, जब तू मुँह बन्द किये हुए छिपा बैठा था, तब भी तुझे खानेको पहुँचाया और जब तेरे दाँत आ गये तब भी तुझे तेरे मुँह खोलते ही खानेको टुकड़ दिया। जिस प्रभुने तेरी गर्भावस्थासे ही—जबकि तू जड़ और मूक था—पालना की है, वही क्या अब तेरी खबर न लेगा? सुन्दरदासजी कहते हैं, तू क्यों चीखता फिरता है? भगवान्का भरोसा रख; वही प्रभु अब भी तेरो पालना करेंगे।
सारंश यह, कि बुद्धिमानको दुनियाके घमण्डी लोगों की खुशामद छोड़, केवल उसकी खुशामद और नौकरी करनी चाहिये, जिसके दिलमें न घमण्ड है और न क्रूरता। जो उसकी शरणमें जाता है, उसीकी वह अवश्य प्रतिपालना करता और उसके दुःख दूर करनेको हाज़र हुज़ूर खड़ा रहता है। मनुष्य! तेरी जिन्दगी अढ़ाई मिनटकी है। इस अढ़ाई मिनटकी