वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७६ )
अहारभा सुन्दरदासजी कहते हैं :—
( १ )
काहे कैं फिरत नर ! दीन भयो घर-घर ।
देखियत, तेरा तो आहार इक सेर है ॥
जाको देह सागर में, सुन्यो शत योजन को ।
ताहूँ कैं तो देत प्रभु, यामें नहिं फेर है ॥
भूखो कोउ रहत न, जानिये जगत माहिं ।
कीरी अर कुम्भर, सबन ही कैं देत है ॥
“सुन्दर” कहत, विश्वास कयँ न राखे शठ ! ।
बेर-बेर समझाय, कहाँ केती बेर है ॥१॥
( २ )
काहे कैं दौरत है दशहूँ दिशि ?
तू नर ! देख कियो हरिज् को ।
बेठि रहै दुखिके मुख मुँदि,
उधारत दौत खवाइहि ठूको ।
गर्भ थके प्रतिपाल करी जिन,
हेइ र्हो तनहीं जड़ मूको ।
“सुन्दर” कयँ बिलात फिरे अन्र !
राख हदे विश्वास प्रभु को ॥२॥
( ३ )
हे पुरुष ! तू दीन होकर कयों घर-घर मारा-मारा फिरता है ? हैब, तेरा पेट तो एक सिर आठमें भर जाता है ! सुनते