भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १७६ )

अहारभा सुन्दरदासजी कहते हैं :—

( १ )

काहे कैं फिरत नर ! दीन भयो घर-घर ।

देखियत, तेरा तो आहार इक सेर है ॥

जाको देह सागर में, सुन्यो शत योजन को ।

ताहूँ कैं तो देत प्रभु, यामें नहिं फेर है ॥

भूखो कोउ रहत न, जानिये जगत माहिं ।

कीरी अर कुम्भर, सबन ही कैं देत है ॥

“सुन्दर” कहत, विश्वास कयँ न राखे शठ ! ।

बेर-बेर समझाय, कहाँ केती बेर है ॥१॥

( २ )

काहे कैं दौरत है दशहूँ दिशि ?

तू नर ! देख कियो हरिज् को ।

बेठि रहै दुखिके मुख मुँदि,

उधारत दौत खवाइहि ठूको ।

गर्भ थके प्रतिपाल करी जिन,

हेइ र्हो तनहीं जड़ मूको ।

“सुन्दर” कयँ बिलात फिरे अन्र !

राख हदे विश्वास प्रभु को ॥२॥

( ३ )

हे पुरुष ! तू दीन होकर कयों घर-घर मारा-मारा फिरता है ? हैब, तेरा पेट तो एक सिर आठमें भर जाता है ! सुनते