भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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मिलती । इसलिये मनुष्यको निष्काम कर्म करने चाहिये ॐ शवा सारे कर्म भगवान्की प्रीतिके लिए करने चाहिये । “गीता”में भी यही बात भगवान् कृष्णने कही है । बहुत लिखनेसे क्या —भगवान्की भक्ति सर्वोपरि है । भगवान्की भक्तिये जो काम हो सकता है, वह घोर-से-घोर तपस्याओंसे भी नहीं हो सकता । किसीने कहा है :—

पठित सकल वेदशास्त्रलपारंगतो वा

यम नियम परो वा धर्मशास्त्रार्थकृद्वा ।

अटित सकल तीर्थत्राजको वाहिताग्निनिहि

हदि यदि रामः सर्वभैततृष्ठा स्यात् ॥

चाहे सारे वेद-शास्त्रोंको पढ़ लो, चाहे यम नियम आदि कर लो, चाहे धर्मशास्त्रको मनन कर लो और चाहे सारे तीर्थ कर लो, अगर आपके दिलमें राम नहीं है, तो ये सब वृथा हैं ।

इसीलिये तुलसीदासजी कहते हैं, कि दोस्तोंसे दोस्ती और दुश्मनोंसे दुश्मनी छोड़कर एवं संसारसे उदासीन होकर भगवान्से प्रीति करो । मतलब यह है, कि न किसीसे राम करो और न किसीसे द्वेष ; सबको उदासीन होकर देखो । जब आपका दिल राम-द्वेष आदिये शुद्ध होगा—इस दुनियामें न कोई आपका प्यारा होगा और न कोई कुप्यारा ; तभी आपका दिल एक भगवान्में लगेगा ।