भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हित सन हित—रति राम सन, रिपु सन वैर विहाय ।

उदासीन संसार सन, “तुलसी” सहज सुभाय ॥

मनुष्य चाहे कल्पवृक्षके नीचे क्यों न चला जाय, जबतक स्तीतापतिकी रूपान न होगी तब तक उसके दुःखोंका नाश नहीं हो सकता ; इसलिये शत्रुता-मित्रता छोड़, संसारसे उदासीन हो, भगवान्से प्रीति करो ।

खुलासा—कहते हैं, इन्द्रके बगीचेमें एक पेसा वृक्ष है, जिसकी छायामें जाकर मनुष्य या देवता जो बीज चाहते हैं, वही उनके पास आप-से-आप आजाती है । उसी वृक्षको “कल्प-वृक्ष” कहते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, जब तक जानकी-नाथ रामचन्द्रजी दया करके प्रसन्न न हों तब तक, मनुष्यकी कल्पना, कल्पवृक्षकी छायामें जानसे भी, नहीं मिट सकती ।

जप, तप, तीर्थ, व्रत, शम, दम, दया, सत्य, शौच और दान वगैरः काम अगर मनमें वासना रखकर किये जाते हैं; यानी करनेवाला यदि उनका फल या पुरस्कार चाहता है, तो उसे स्वर्गादि मिलते हैं । स्वर्गमें जाने से मनुष्यका आवागमन—इस दुनियामें आना और यहाँसे फिर जाना—पैदा होना और मरना—नहीं बन्द हो सकता । क्योंकि कहा है—“पुण्ये क्षीणे मृत्युलोकै” अर्थात् पुण्योंके क्षीण होते ही फिर स्वर्गसे मृत्यु लोकमें आना पड़ता है । उपरोक्त जप-तप आदिसे स्वर्ग तो मिलता है, पर मनुष्यका असल मकसद पूरा नहीं होता ; यानी उसे परमपद या मोक्ष नहीं

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